Friday, 28 February 2014

मोदी की रैलियों में भारी भीड़ से कांग्रेस हतप्रभ


धाराराम यादव
भाजपा द्वारा घोषित प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी एवं गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदी की रैलियों में लाखों की अपार भीड़ उमड़ने से कॉंग्रेस सहित सभी तथाकथित पंथनिरपेक्षतावादियों में अफरा-तफरी का माहौल है। लगातार पंथनिरेक्षता मंत्र का जाप करने वाले हतप्रभ हैं। उनकी अनर्गल बयानबाजियों का प्रभाव मोदी की रैलियों में अपार भीड़ के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है। कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के संभावित प्रत्याशी एवं पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गॉंधी घबराहट में अपनी रैजियों में ऐसी-एसेी बेतुकी बांते कर रहे हैं, जिससे ज्ञात होता है िकवे न केवल अपना आपा खो रहे हैं, वरन् निकट अतीत के अपने थोथे ज्ञान की भी खिल्ली उड़वा रहे हैं और जनता को भी भ्रमित कर रहे हैं। 
राहुल गॉंधी ने एक रैली में यह रहस्योद्घाटन करके उत्तर प्रदेश सरकार सहित केन्द्र सरकार एवं देश की प्रबुद्ध जनता को चौंका दिया कि मुजफ्फरनगर के दंगा पीडि़त मुस्लिम नवयुवक पाकिसन की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के सम्पर्क में हैं। यह बात उन्हें एक गुप्तचर अधिकारी ने बताई है। यहीं यह प्रश्न उठता है कि क्या देश का गुप्तचर विभाग राहुल गांधी को अपनी जॉंच-पड़ताल के निष्कर्षो से अवगत कराता है? और राहुल जी गुप्तचर विभाग से प्राप्त सूचना का दुरूपयोग अपनी रैजियों में करते हैं। सारा देश जानता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरागांधी की हत्या उनके निवास के भीतर दो सिख सुरक्षाकर्मियों द्वारा की गयी थी, जिसके बाद कांग्रेसी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं द्वारा देशभर में करीब चार हजार निर्दोष सिखों की हत्यायें करवाई गयी थी। राहुल ने इसके बाद अपने पिता की हत्या किये जाने का उल्लेख किया जिन्हें लिट्टे उग्रवादियों ने मई 1991 में मारा था। इस भावनात्मक भाषण का रूख भाजपा की ओर यह कहकर मोड़ दिया कि भाजपा नफरत की राजनीति करती है और एक दिन वे स्वयं मार दिये जायेंगे, जिसकी उन्हें चिन्ता नहीं है। राहुल गांधी ने अपने इस भावनात्मक अनर्गल भाषण को इस संदर्भ के साथ प्रस्तुत किया मानों उनकी दादी और पिता की हत्या में कहीं से भाजपा का हाथ था। उनकी इस गलत बयानी का संज्ञान चुनाव आयोग सहित न्यायपालिका को भी लेना चाहिए। राहुल जी को भाषण की नफरत की राजनीति का अकाट्य प्रमाण भी देना चाहिए। 
राहुल गॉंधी ने राजस्थान और मध्यप्रदेश की अपनी चुनावी रैलियों में अनर्गल बातें कहीं। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा साम्प्रदायिकता फैला रही है जिसके परिणाम स्वरूप आतंकवाद फैल रहा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गॉंधी सहित उनकी पूरी पार्टी को खुली चुनौती है कि उनमें से कोई विद्वान देश के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में बिना किसी दल का नाम लिए साम्प्रदायिकता एवं पंथनिरपेक्षता को उसके लक्षणों एवं कारक तत्वों सहित दो टुक व्यारव्यथित एवं परिभाषित कर दें। यह चुनौती देश के सभी तथा कथित पंथनिरपेक्ष दलों द्वारा घोषित परिभाषा के कारण वे दल अपने आचरण,कार्यो एवं वक्तब्यों से स्वयं साम्प्रदायिक सिद्ध हो जायॅं तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए। उत्तर प्रदेश की वर्तमान समाजवादी पार्टी सरकार ने मार्च 2012 में शपथ ग्रहण करते ही यह घोषणा कर दी कि केवल मुस्लिम लड़कियों को हाईस्कूल उत्तीर्ण करते ही तीस हजार रूपये एक मुश्त अनुदान दिया जायगा। कुछ दिनों बाद यह आदेश जारी कर दिया कि आतंकी विस्फोटों के सिलसिले में गिरफ्तार किये गये मुस्लिम युवकों को रिहा कर दिया जाय। यह बात अलम है कि जिला प्रशासन सहित न्यायापालिका द्वारा सरकार के इस आदेश को अनुचित मानते हुए मानने से इंकार कर दिया गयां इसी प्रकार देश के प्रधानमंत्री पर पहिला हक मुस्लिमों का है। देश के सभी विचारवान लोग बतायें कि सपा सरकार एवं कांग्रेसी प्रधानमंत्री डा0मनमोहन सिंह द्वारा एक धर्म के अनुयायियों के सम्बंध की गयी घोषणा पंथनिरपेक्ष है या साम्प्रदायिक?
अब सीधे-सीधे यह निष्कर्ष निकलता है कि इन पंथनिरपेक्षदलों के अनुसार पंथनिरपेक्षता की परिभाषा हर स्तर पर मुस्लिम पक्षधरता ही मानी जायगी। इसे ही तुष्टि करण आदि का नाम दिया जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(1)एवं 16 (2) में धर्म के आधार पर सेवायोजन आदि में विनोद निषिद्ध होने के बावजूद मुस्लिमों को राजकीय सेवाओं में बार-बार आरक्षण का शिगूफा पंथनिरपेक्ष दलों द्वारा छोड़ा जाता है। यह बात अलग है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे हर बार रद्द कर दिया जाता है। आखिरी बार उत्तर प्रदेश आदि विधान सभा को चुनावों के पूर्व मुस्लिम समुदाय को सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गो के 27 प्रतिशत आरक्षण में 4.5 प्रतिशत मुस्लिमों के लिए आरक्षित कर दिया गया। जबकि पिछड़े वर्गो की सूची में 21 मुस्लिमों की जातियॉं शामिल हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे आरक्षण रद कर दिया गया। राहुल गॉंधी, नितीश कुमार, मुलायम सिंह यादव सहित अनेक तथा कथित पंथनिरपेक्ष राजनेता बार-बार यह अनर्गल आरोप लगाते रहते हैं कि भाजपा नफरत फैलाती है और सबको मिलाकर नहीं चलती। उनमें से किसी में इतनी ईमानदारी और साहस नहीं है कि वे कथन को सप्रमाण सिंद्ध करें। बार-बार वर्ष 2002 में हुए गुजरात व्यापी साम्प्रादायिक दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी को जिम्मेवार ठहराया जाता है किन्तु किसी पंथनिरपेक्षतावादी में इतनी ईमानदारी शेष नहीं है कि 27 फरवरी, 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर वहां के मुस्लिम समुदाय द्वारा 59 हिन्दू रामकार सेवकों को ट्रेन की बोगी में पेट्रोल-डीजल छिड़कर जीवित जलाकर मार डालने के बारे में उत्तरदायित्व निर्धारित करते। उस पर प्रश्न उठाते। आखीरकार जिस लोमहर्षक एवं वीभत्स घटना के कारण गुजरात व्यापी साम्प्रदायिक दंगा शुरू हुआ, उसके बारे में पूरा विवरण भी जनता के सामने आना चाहिए। उस साम्प्रदायिक दंगे के पूर्व भी गुजरात में कांग्रेस के शासनकाल में भी कई भयंकर दंगे हो चुके थे। वर्ष 1969 में 18 सितमबर में 22 सितम्बर तक कांग्रेसी मुख्यमंत्री हितेन्द्र देसाई के काल में भयंकर दंगा हुआ था। जिसमें मुस्लिम समुदाय के 500 लोग मारे गये थे। रेड्डी आयोग की रिपोर्ट में उसका पूरा विवरण है। 
प्रधानमंत्री इंदिरागांधी की 31अक्टूबर 1984 को उनके दो सुरक्षा कर्मियों द्वारा की हत्या की प्रतिक्रिया में 3-4 दिन के भीतर करीब चार हजार निर्दोष सिखों की हत्या करवायी गयी थी। करना ही है तो दोनों नरसंहारों का एक साथ उत्तरदायित्व निर्धारित करें। दोनों नरसंहारों में अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया गया। ये दोनों वीभत्स हत्यायें हत्याओं की र्प्रतिक्रिया में हुई थी। 
जमायते उल्माये हिन्दू के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने इस सच्चाई पर से परदा उठाकर देश के सभी पंथनिरपेक्षतावादियों की बोतली बंद कर दी कि गुजरात में 2002 के बाद विगत ग्यारह वर्षो में कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ जबकि कथित सेकुलर दल कांग्रेस के शासनकाल में राजस्थाना में चार दर्जन साम्प्रदायिक दंगे हो चुके हैं जबकि दूसरे मूर्धन्य पंथनिरपेक्ष दल समाजवादी पर्टी के उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के करीब डेढ़ वर्ष के शासनकाल में 107 साम्प्रदायिक दंगे हो चुके हैं। अंतिम भीषण दंगा मुजफ्फर नगर में अगस्त-सितम्बर में हुआ जिसमें प्रदेश सरकार के एक मंत्री संलिप्तता सहित उत्तर प्रदेश सरकार की निष्क्रियता सर्वोच्च न्यायालय में विचार हो रहा है। उत्तर प्रदेश सराकर द्वारा माननीय सुप्रीम कोर्ट को अपनी सफाई दे दी गयी। दंगे पर माननीय कोर्ट की टिप्पणी पर उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता को हटा दिया गया। 
27.02.2002 को जब गोधरा के रेल ट्रैक पर 59 लोग जीवित जलाकर मारडाले गये थे, तो रेल मंत्रालय के मुखिया धुरंधर सेकुलर नितीश कुमार ही थे जो रेल यात्रियों को सुरक्षा प्रदान करने में असमर्थ रहे। उन्हें यह बताना चाहिए कि उस लोम हर्षक नरसंहार के बाद वे कितनी बार गोधरा गये थे और क्या किया था? 
साम्प्रदायिक शक्तियों की रट लगांने वाले ही बता दें कि वे कितने पंथनिरपेक्ष हैं एवं उनकी पंथनिरपेक्षता की क्या विशेषता है? स्मरणीय है कि पंथनिरपेक्षता का बहुत सीधा साअर्थ है कि देश के सभी नागरिकों के साथ उनकी जाति और मजहब का विचार किये विना कानून एवं संविधान के अंतर्गत समान व्यवहार करना। अपनी वोट बैंक की राजनीति को तिलांजलि देकर सभी योजनओं को सभी नागरिकों के हित में समान रूप से लागू करना। इसके विपरीत किसी धर्म विशेष के लोगों के प्रति कानून की उपेक्षा करके व्यवहार करना पंथनिरपेक्षता नहीं हो सकती। 
नरेन्द्र मोदी के गुजरात में मुस्लिम अल्पसंख्यक उत्तर प्रदेश बिहार राजस्थान आदि तथाकथित पंथनिरपेक्षतावादी 2002 के गुजराज व्यापी साम्प्रदायिक दंगो के लिए नरेन्द्र मोदी के प्रति दुर्भावना रखते हैं। तो 1984 के सिख नरसंहार के लिए कांग्रेस के प्रति भी वही रवैया घोषित करना चाहिए। वर्ष 2002 के गुजरात व्यापी साम्प्रदायिक दंगों में 1159 लोग मारे गये थे जिसमें 790 मुस्लिम समुदाय के और 369 हिन्दू समुदाय के लोग मृतकों में शामिल थे जबकि1984 के सिख नरसंहार में 3874 लोग मारे गये थे जिनमें एक भी गैर सिख शामिल नहीं था। 
गुजरात की प्रगति एवं विकास की सारे देा में और अन्तर्राष्ट्रीय जगत में प्रशंसा हो रही है। गत 27 अक्टूबर 2013 को बिहार की राजधानी पटना में आयोजित नरेन्द्र मोदी की विशालतम रैली को वहां की नितीश कुमार की पंथनिरपेक्ष सरकार समुचित सुरक्षा प्रदान करने में लापरवाह रही। वहॉं सात बम विस्फोट हुए जिसमें 6 लोग मारे गये एवं एक सौ से ज्यादा घायल हो गये जिनका पटना मेडिकल कालेज में उपचार चल रहा है। नरेन्द्र मोदी की विशाल रैली देखकर और उनका भाषण सुनकर जद(यू)में बगावत हो गयी। जब नितीश कुमार को अपना घर बचाना कठिन हो रहा है। अब तक नितीश कुमार खुलकर नरेन्द्र मोदी विरोध और भाजपा से अपना 17वर्ष पुराना गठबंधन तोड़ने का कोई समुचित कारण नहीं बता सके और यादि कोई कारण हो तो साहस और ईमानदारी से उसे घोषित कर देना चाहिए। वे यह भी कहने के लिए स्वतंत्रत है कि इस प्रकार उन्होंने अपना मुस्लिम वोट वैंक सुरक्षित कर लिया है।

उच्च शिक्षा में स्वर साधने की व्यर्थ कवायद



डॉ0 दिलीप अग्निहोत्री
जो लोग केवल पठन-पाठन का उद्देश्य लेकर उच्च शिक्षा सेवा में दाखिल हुए थे, उन्हंे अब नये सिरे से सोचना होगा। उनसे अब पहले जैसी अपेक्षा नहीं रही। मुख्य उद्देश्य पहले जैसा नहीं रहा। पहचान का मापदण्ड बदल गया। अध्ययन और अध्यापन के प्रति पहले जैसे समर्पण की आवश्यकता नहीं रही। कक्षा छोड़कर प्रमाण-पत्र बटोरने का संदेश दिया जा रहा है। इसे एक हद तक बाध्यकारी बनाने का प्रयास हो रहा है। बच्चों को क्या पढ़ाया, कितना पढ़ाया, किस तरह पढ़ाया, इसका महत्व कम किया जा रहा है। इसमंे संदेह नहीं कि समय के साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी परिवर्तन होना चाहिए। पाठ्यक्रम तथा तकनीक मंे आवश्यकता के अनुरूप बदलाव होने चाहिए। इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। लेकिन परिवर्तन की दिशा-दशा पर अवश्य विचार होना चाहिए। क्या किसी शिक्षक का वास्तविक आकलन राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार में भागीदारी से हो सकता। अब तो बात भागीदारी तक सीमित नहीं रही। सेमिनार मंे शोध-पत्र प्रस्तुत करने पर ही उसके कैरियर मंे अंक जुड़ेंगे। क्या शोध पत्र लेखन से शिक्षक की उपयोगिता प्रमाणित हो सकती है। क्या किताब न लिखने वाले शिक्षक को अच्छा नहीं माना जा सकता। परिवर्तन बड़ी तेजी से चल रहे हैं। अब किताब पर आईएसबीएन नम्बर होगा, तभी शिक्षक के अपने नम्बर बढ़ेंगे। किताब कैसी है, कितनी उपयोगी है, उसकी क्या सार्थकता है, विद्यार्थियों या समाज के लिये उसका क्या महत्व है, इन बातों का कोई मतलब नहीं। इधर आईएसबीएन नम्बर मिला, उधर शिक्षक की योग्यता मंे पच्चीस नम्बर बढ़ गये।
परिवर्तन के इन प्रयोगों से थोड़ा पीछे लौटिए। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों मंे शिक्षा के प्रति पूरी तरह समर्पित शिक्षकों की कमी नहीं थी। इनमंे ऐसे अनेक शिक्षक होते थे, जिन्होंने अपने जीवन में कोई किताब नहीं लिखी, प्रोजेक्ट नहीं किये, विदेश यात्रा की कौन कहे, वह अपना शहर छोड़ने के पहले भी चार बार सोचते थे। उनका लक्ष्य केवल एक होता था कि किस प्रकार अपनी क्लास में बेहतर शिक्षा दें। क्लास के बाहर भी गुरू-शिष्य परम्परा का निवाघर््ह करते थे। छात्रों के हित के लिये सदैव तत्पर रहते थे। मैं जब यह लिख रहा हूं, मुझे स्नातक-स्नातकोत्तर के समय अपने शिक्षक याद आ रहे हैं। पूरे सत्र में मैंने कभी नहीं सुना कि वह किसी राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार मंे शामिल होने गये हैं, इसलिए क्लास में नहीं आयेंगे। कभी नहीं सुना कि वह शोध-पत्र या किताब लिखने में बहुत व्यस्त हैं, इसलिए क्लास पर कम ध्यान दे रहे हैं। ऐसे अध्यापकों को मैंने लिखते नहीं देखा, लेकिन सदैव पढ़ते देखा। घर में, पुस्तकालय में उनको पढ़ाते ही देखा। लगा कि वह हम विद्यार्थियों को ज्ञान देने, अपडेट करने के लिये इतनी मेहनत करते हैं। वहीं ऐसे भी शिक्षक थे जो स्वेच्छा से किताबें, शोध पत्र लिखते थे। लेकिन इसके पीछे आत्म प्रेेरणा थी। बाध्यता नहीं थी। उद्देश्य उनका भी वही था। क्लास में अच्छी शिक्षा देना। यह उनका परम लक्ष्य था। लेखन साथ-साथ स्वाभाविक रूप में चलता था। दोनों भूमिकाओं में कोई टकराव नहीं था। अब बाध्यता है, इसलिए विसंगति है। 
मैंने अपनी पीएचडी प्रो0 मदन मोहन पाण्डेय के निर्देशन मंे की थी। वह डीएवी कानपुर मंे राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष थे। उन्होंने अपने जीवन में केवल दो किताबें लिखीं। लेकिन क्लास रूम में उनके बारे में प्रसिद्ध था कि उन्हंे राजनीतिशास्त्र की सैकड़ों किताबों की लाइनें और पेज संख्या तक याद है। आदर्श शिक्षक माने जाते थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी डीएवी कानपुर में उनके शिष्य थे। प्रो0 पाण्डेय से पढ़ने के लिये विद्यार्थी लालायित रहते थे। वह बाद में कानपुर के ही डीबीएस पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में प्राचार्य हुए थे। बात पुरानी है। स्व0 प्रो0 पाण्डेय जैसे आदर्श शिक्षक आज प्रोफेसर बनने के लिये फार्म भरने लायक नहीं माने जाते। बिना आईएसबीएन नम्बर वाली मात्र दो किताबें उन्हें अयोग्यों की श्रेणी में पहुंचा देतीं।
उच्च शिक्षा मंे कमजोर कडि़यां उस समय भी थीं, वही आज भी क्लास मंे शिक्षा देने को अपना लक्ष्य मानने वाले योग्य व समर्पित शिक्षक हैं। लेकिन इनमें अनेक शिक्षक अब विश्वविद्यालयों में रीडर, प्रोफसर नहीं बन सकते। उन्हंे प्वाइंट के बल पर अपनी योग्यता साबित करनी होगी। अन्यथा वह दौड़ से बाहर रहेंगे। कैसी विडम्बना है। यदि कोई शिक्षक अपने एक-दो दशकों के कैरियर में निष्ठा से पढ़ाता रहा, उसने अन्य कार्यों पर ध्यान नहीं दिया, तो उसके लिये संदेश साफ है। वह प्रोफेसर रीडर पद के लिये आवेदन नहीं कर सकता। उसके लिये पिछले दशकों का कोई महत्व नहीं रहा। कुछ महीने पहले आदेश निर्गत हुआ फिर प्वाइंट के आधार पर अर्हता का निर्धारण शुरू हो गया। रिक्तियां निकलीं। फार्म मंे कालम बना दिये गये। इसमंे सेमिनार के प्रेजेन्टेशन पर प्वाइंट बताने हैं, आईएसबीएन नम्बर वाली किताबों के प्वाइंट हैं, रिफ्रेसर-ओरिएन्टेशन के प्वाइंट हैं, निर्धारित जर्नल्स में प्रकाशित शोध पत्रों के प्वाइंट हैं। जितने कालम दिये गये, वही भरने हैं। इसके बाहर ज्ञान का क्षेत्र समाप्त हो जाता है। फरमान यही है। कालम में चार सौ प्वाइंट हो जाएं, तभी फार्म मंजूर होगा। यह राजाज्ञा है। किसी ने मौलिक लेखन किया, लेकिन आईएसबीएन नम्बर नहीं मिला, तो उसे कूड़ा समझा जायेगा।
देश के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों मंे ऐसे विभाग होना आम बात है, जहां केवल एक स्थायी शिक्षक है। उससे भी अपेक्षा की जा रही है कि वह रिफ्रेसर-ओरिएन्टेशन, सेमिनार में शामिल होता रहे। क्लास वरीयता में नहीं रहे। शिक्षकों से लेखन की अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन इसे योग्यता या कैरियर से जोड़कर बाध्यकारी बनाना गलत है। पहले वरिष्ठ शिक्षक कनिष्ठों के सामने उदाहरण पेश करते थे। वह खूब पढ़ते-पढ़ाते थे। आज कैसे लोग प्रेरणा दे रहे हैं। जो पांच-दस पेपर लिखकर पूरे देश में घूमते हैं। घुमा-फिराकर हर जगह वही बातें। यह सिलसिला दशकों तक चलता है। ये सेमिनार-संगोष्ठियों के विशेषज्ञ हो जाते हैं। नीति-निर्माण पर उनका प्रभाव होता है। वैसे ही नियम बन रहे हैं। शिक्षा मंे सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। योग्यता निर्धारण के नियमों से ऐसा अवश्य लगता है जैसे कोई लाठियों से मार-मार कर किसी को गाने के लिये बाध्य कर रहा है। ज्ञान की धारा कैसे बहेगी? शिक्षा सरस कैसे होगी। इन प्रश्नों का जवाब नीति निर्याताओं के पास नहीं है।

क्या दशकों से लटके मुकद्दमें न्यायिक अराजकता नहीं हैं?


डा. विनोद बब्बर
पिछले दिनों देश की सबसे बड़ी अदालत ने फांसी या माफी के इन्तजार में लटके लोगों को राहत देते हुए उनकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट के बाद उच्चतम न्यायालय तक में दोषी साबित हो चुके ये लोग निश्चित रूप से सजा के हकदार हैं लेकिन दशको से कोर्टे के न्याय की इन्तजार में धक्के खा रहे निर्दाष लोगो को राहत देने के मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत का मौन खलता है। अनेक मामले तो देश के लिए नासूर बने हुए है न्याय का सर्वभौमिक सिद्धांत है, ‘बेशक हजार दोषी छूट जाए लेकिन कोई निर्दोष फांसी पर नहीं चढ़ना चाहिए। आश्चर्य है कि दोषियों के मानवाधिकारों की चिंता को सभी को है लेकिन निर्दोषों के प्रति कोई समय सीमा निर्धारित करने में हम असफल रहे हैं।
इस बात से किसे इंकार होगा कि फांसी या माफी पर जल्द अथवा एक समय सीमा के अंतर्गत फैसला होना चाहिए लेकिन करोडो मुकदमो के निपटान पर भी तो कोई समय सीमा निर्धारित होनी चाहिए। वास्तव में मुकदमो का लम्बे समय तक लटकते रहना स्वयं फैसला करने की प्रवृति को बढ़ाता है जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अपराधो को बढ़ावा ही है। मुकद्में किस तरह चलते हैं इसका स्वयं भुगता एक उदाहरण देखे- चौक वापसी से संबंधित नियम में स्पष्ट कहा गया है-‘मामला दर्ज होने के छ मास के अंदर उसे पूरा किया जाएगा।’ जबकि मेरे मामले में छ वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी ‘पूरा करने’ जैसी कोई संभावना नजर नहीं आती। इस मामले में तो एक बार 14 माह बाद की तारीख दी गई। लगभग हर दूसरी बार जज अथवा कमरा बदल जाता है तब सुनवाई नहीं केवल अगली तारीख की औपचारिकता पूरी की जाती है। एक बहुचर्चित जज साहब ने तो 50 मिनट में 60 से अधिक मामले निपटाए। हमारा नंबर 60 था। जब तक हमारे वकील साहिब उपस्थित होते उन्होंने कई महीनों बाद की तारीख देते हुए अपनी ओर से ‘न्याय’ देने का कर्मकांड पूरा कर दिया। आज तक 23 तारीखों में स्वयं और वकील सहित उपस्थिति का का समय मूल्य चौक की राशि से अधिक हो चुका है ऐसे में जब भी हो, जीत आखिर हार से कैसे भिन्न होगी। 2008 में विधि मंत्री ने ससंद में बताया था कि ‘चेक वापस होने वाले मामलों से निपटने के लिए एक विशेष तंत्र पर विचार किया जा रहा है।’ आश्चर्य की उनका विचार विचारों से आगे ही नहीं बढ़ा।
न्याय में देरी का मुद्दा महत्वपूर्ण है। ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनका पूरा जीवन ही न्याय के इंतजार में बीत गया। कहा गया है ‘जस्टिस डिलेड इज, जस्टिस डिनाइड’ अर्थात् ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना ही है’ क्या यह सत्य नहीं कि आज न्यायालयों में न्याय के नाम पर ‘तारीख पर तारीख’ ही तो मिलती है। एकाधिक स्वयं देश की सबसे बड़ी अदालत भी इस स्थिति पर अपना पीड. और चिंता जता चुकी है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में न्याय मिलने में काफी वक्त लगता है और यह प्रक्रिया काफी खर्चीली है। एक दीवानी मामले के निपटारे पर औसतन 15 वर्ष, तो आपराधिक मामले में पांच से सात वर्ष तक का वक्त लगता है। कई मामलों में तो यह अवधि इससे दुगनी अथवा ज्यादा भी हो सकती है। वर्तमान में तीन करोड़ से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं। (उच्चतम न्यायालय में ही पचास हजार से अधिक मामले लंबित हैं) जबकि न्यायाधीशों के स्वीकृत मात्र लगभग अठारह हजार पदों में से एक चौथाई रिक्त हैं। साधनों की कमी के नाम पर ऐसा होता है। इसीलिए विधि आयोग की रिपोर्ट में इस ओर संकेत किया गया है कि भारत, दुनिया में आबादी एवं न्यायाधीशों के बीच सबसे कम अनुपात वाले देशों में से एक है। अमरीका और ब्रिटेन में 10 लाख लोगों पर करीब 150 न्यायाधीश हैं जबकि भारत में 10 लाख लोगों पर सिर्फ 10 न्यायाधीश हैं। ऐसे में अंतहीन देरी के अतिरिक्त आखिर और क्या संभव है क्योंकि आज भी अंग्रेजों के काल से जारी अनेक नियम जैसे अंग्रेज जज गर्मी में लम्बी छुट्टी पर जाते थे, आज भी जारी है जबकि शेष सरकारी कामकाज हर मौसम में जारी रहता है। आश्चर्य है कि हर छोटे-बड़े मामले में जनहित याचिका के नाम पर अथवा स्वयं संज्ञान लेकर सुनवाई वाले उच्चतम न्यायालय ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि जब गाड़ी से जज साहब के चौम्बर तक हर जगह वातानुकुलित व्यवस्था है तो फिर गर्मी-सर्दी की छुट्टियों का क्या औचित्य है?
माना कि कुछ मामलों में अपरिहार्य कारणों से देरी हो सकती हैं लेकिन अधिकांश मामलों में देरी अनावश्यक है जैसे झारखण्ड में निचली अदालतों में चल रहे कुल तीन लाख मामलों में से एक चौथाई अर्थात् 75 हजार मामलों में पुलिस रिपोर्ट न सौंपने के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही। केंद्र और राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों, सार्वजनिक क्षेत्र के प्राधिकरण के बीच चल रहे लाखों मामलों को आपसी तालमेल से निपटाकर अदालतों का बोझ कम किया जा सकता है। इसी प्रकार देश में सर्वाधिक मुकदमे चौक वापसी, मोटर दुर्घटना, औद्योगिक विवादों से संबंधित तथा छुटपुट अपराधों के हैं जिन्हें बहुत आसानी से कुछ बैठकों में निपटाया जा सकता है। एक बार में ही सारे सबूत सौंपने तथा अगली तारीख पर प्रतिवादी द्वारा उसका जवाब अनिवार्य कर मामलें को लम्बा खिंचने से रोका जा सकता है। यदि कोई पक्ष जानबूझकर मामले को लटकाने का प्रयास करता है तो उसका संज्ञान लेते हुए उसके विरुद्ध टिप्पणी की जानी चाहिए। इससे अतिरिक्त कुछ वर्ष पूर्व अदालतों की कार्य प्रणाली में सुधार लाने के लिए आरंभ किए गए उपायों जैसे सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों से सभी जिला अदालतों तक के कम्प्यूटरीकरण और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के बुनियादी ढांचे को उन्नत करने के लिए योजना का कार्य तेजी से बढ़ाया जाना चाहिए। इसके लिए संसाधनों की कमी नहीं होनी चाहिए क्योंकि न्यायविहीनता अशांति को जन्म देती है अतः व्यवस्था बनाए रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। सांध्यकालीन अदालतें की स्थापना के साथ-साथ सभी को एक ही समय बुलाने की बजाय क्रमबद्ध ढ़ंग से अलग-अलग समय दिया जाए जिससे अदालतों में अनावश्यक भीड़ नहीं होगी और कार्य सुचारू रूप से चलेगा।
अदालती विलंब का एक कारण कई मुद्दों पर संशय भी होता है। ऐसे में यह लगता है कि मानो कानून अस्पष्ट है। अनेक बार उच्च न्यायालय के सामने भी ऐसी अनिश्चितता की स्थिति रहती है तो एक ही अथवा एक जैसे मामलो में अलग-अलग फैसले आते हैं। यहाँ एक उदाहरण देना पर्याप्त होगा। अगर कोई व्यक्ति किसी आपराधिक मामले की शिकायत थाने में करता है तो पुलिस अक्सर एफआइआर दर्ज नहीं करती है, जबकि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अनुसार कोई शिकायत आती है तो पुलिस के लिए प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है। उच्चतम न्यायालय के इस पर कई फैसले हैं। सात निर्णयों में कहा गया है कि प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है जबकि तीन निर्णयों में इसकी उलटी व्यवस्था दी गई है। स्थिति स्पष्ट करने के लिए 2012 में ललित कुमारी मामले में इसे संविधान पीठ को सौंपा गया है जिसपर निर्णय में विलंब नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह प्रवृति भी देखी जा रही है कि सामान्य मुकद्दमों के लिए बेशक समय न हो पर राजनैतिक मामलों की हर रोज सुनवाई होती है।
कभी-कभी न्याय के साथ किस प्रकार की अजीब स्थितियां होती है उसका एक उदाहरण जेसिका लाल हत्याकांड है जिसमें पैंतीस गवाह मुकर गए तो अभियुक्त बरी हो गए। जब यह मामला उच्च न्यायालय में गया तो न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी ने निर्णय को पलटते हुए न केवल जिला जज पर कठोर टिप्पणी भी की बल्कि मुकरने वाले गवाहों के खिलाफ मुकदमे का आदेश दिया था जिसपर आज तक निर्णय नहीं आया।
उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने पी. रामचंद्र राव बनाम कर्नाटक (2002) मामले में हुसैनआरा मामले की इस बात को दोहराया कि, शीघ्र न्याय प्रदान करना, आपराधिक मामलों में तो और भी अधिक शीघ्र, राज्य का संवैधानिक दायित्व है, तथा संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 21, 19, एवं 14 तथा राज्य के निर्देशक सिद्धांतों से भी निर्गमित न्याय के अधिकार से इंकार करने के लिए धन या संसाधनों का अभाव कोई सफाई नहीं है। विशेषज्ञों का मत है कि जब न्याय तंत्र में जनता का भरोसा कम हो जाता है तो उनमें विवादों के स्वयं निपटान की प्रवृति और सामाजिक अराजकता बढ़ती है इसलिए व्यवस्था को तुरंत सचेत होकर न्याय तंत्र में लोगों का भरोसा तुरंत बहाल करने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। फांसी के विरूद्ध अपील के लिए एक निश्चित समय सीमा तय होनी चाहिए तथा उसका पालन न करने वाले के लिए दण्ड का प्रावधान हो, न कि माफी जैसी एक गलत परंपरा की शुरुआत है। अपराधी केवल अपराधी होता है उसका न कोई धर्म है और न ही कोई जाति। अगर उनके लिए न्याय के नाम पर कुछ अलग परम्पराएं कायम की गई तो यह न तो न्याय के हित में नहीं होगा और न ही राष्ट्र हित में।

नए राज्य पुर्नगठन आयोग की जरूरत


राजकुमार गर्ग
संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा से तेलंगाना विधेयक पास होने के बाद अब आंध्र प्रदेश के विभाजन और देश के नए २९वे प्रदेश तेलगांना के गठन का रास्ता साफ हो गया है। लोकसभा और राज्य सभा में तेलंगाना विधेयक पर भारी हंगामा हुआ। संसद के दोनों सदनों में तेलंगाना के विरोधी सांसदो ने अशोभनीय आचरण करके सारी मर्यादाए तार-तार कर दी। लोकसभा में चाकू निकाला गया, मिर्च का स्प्रे किया, राज्यसभा उपाध्यक्ष से हाथापाई की गई। विधेयक की प्रतियां फाडी गर्ठ। विधेयक फाडकर प्रधानमंत्री पर फेंका गया। गृह मंत्री के हाथ से विधेयक छीना गया। तेलंगाना को लेकर कांग्रेस में ही विरोध हुआ। आंध्र के मुख्यमंत्री किरण रेड्डी ने मुख्यमंत्री पद, कांग्रेस और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। सीमांध्र इलाके के केन्द्रीय मंत्रियों और कांग्रेस सांसदों ने भी विरोध किया। आंध्र के बटंवारे से सीमांध्र को होने वाली क्षतिपूर्ति के लिए विधेयक में ५ वर्ष के लिए सीमान्ध्र को विशेष पैकेज और विशेष दर्जा देने का प्रावधान किया गया। तेलंगाना विधेयक पर आंध्र के सीमांध्र क्षेत्र के कांग्रेसी सांसदो के अलावा तेलगू देशम पार्टी, शिवसेना, वामपंथी दलो, तृणमूल कांग्रेस, सपा आदि ने भी विरोध किया, लेकिन भाजपा के समर्थन से कांग्रेस ने भारी शोरगुल के बीच संसद के दोनों सदनों में तेलंगाना विधेयक पास करा लिया। आंध्र में कांग्रेस के गिरते जनाधार के कारण कांग्रेस को तेलंगाना क्षेत्र से सीटो की उम्मीद है। इसलिए कांग्रेस ने भाजपा के समर्थन से तेलंगाना विधेयक पास कराया। तेलंगाना के विरोध में आंध्र में पिछले दिनों भारी हिंसा हुई थी। तेलंगाना की मांग नई नहीं है बल्कि ४० साल पुरानी है। इस मांग को लेकर हुए आंदोलनों में करीब ३५० लोगों की जान भी जा चुकी है। नए प्रदेश की मांग तेलंगाना क्षेत्र की अनदेखी से उठी थी। तेलंगाना क्षेत्र में जल, रोजगार के अवसर और विकास में पूरी भागीदारी नहीं मिलने से आंध्र में अलग तेलंगाना बनाने की मांग को बल मिला। आजादी के बाद आंध्र प्रदेश देश का पहला प्रदेश था जिसका गठन भाषाई आधार पर हुआ था। तेलंगाना का विरोध करने वालो का तर्क था कि आंध्र के गठन के बाद पूरे आंध्र का सर्वांगीण विकास हुआ है। तेलंगाना क्षेत्र की अनदेखी का आरोप गलत है। तेलंगाना विवाद में तेलंगाना को अलग करने की मांग तो पहले सीमांध्र से ही उठी थी। १९७२ में तेलंगाना को आंध्र से अलग करके जय आंध्र नाम से प्रदेश बनाने की मुहीम शुरू हुई थी। इसके लिए आंदोलन भी हुआ था। भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन पुराने मद्रास राज्य और नवाबशाही राज्य हैदराबाद के तेलगू बोलने वाले इलाको को मिलाकर किया गया था। आंध्र के लोग अंग्रेजी शासनकाल से ही मद्रास राज्य से तेलगू भाषी क्षेत्र को अलग करने के लिए संघर्ष करते रहे थे, लेकिन सफल नहीं हुए थे। देश आजाद होने के बाद गांधीवादी नेता पोट्टी श्री रामुलू ने आंध्र प्रदेश के गठन की मांग को लेकर आमरण अनशन किया था। रामुलू की १५ दिसंबर १९५२ को मृत्यु होने के बाद नेहरू सरकार ने मजबूर होकर लोकसभा में आंध्र प्रदेश बनाने की घोषण करनी पड़ी। एक अक्टूबर १९५३ को आंध्र प्रदेश बना। इसकी राजधानी कुर्नुल बनी। 
तेलंगाना का विरोध राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक रहा है। केवल हैदराबाद का तेलंगाना में शामिल होना ही इसके विरोध का कारण नहीं है बल्कि इसके पीछे उद्योगपतियों का पूरा खेल रहा है। सीमांध्र के उद्योगपतियों का हजारों करोड़ रुपए का निवेश हैदराबाद में है। तेलंगाना के लोगों ने सीमांध्र की दादागिरी से त्रस्त होकर ही अलग तेलंगाना बनाने की मांग उठाई थी। भाषा के आधार पर प्रदेश बनाने की शुरूआत अंग्रेजी शासनकाल में ही शुरू हो गई थी। भाषा के आधार पर अंग्रेजी शान में पहले प्रदेश उडीसा (वर्तमान ओडिशा) बना था। भाषाई राज्य बनाने के लिए अनेक स्थानों पर दंगे भी हुए थे। पंजाबी भाषी पंजाबी सूबा बनाने तथा गुजराती भाषी गुजरात बनाने और मराठी भाषी महाराष्टड्ढ्र बनाने के लिए व्यापक हिंसा भी हुई थी। भाषाई प्रदेश बनने से दूसरे प्रदेशों की भाषा वाले लोगों को कठिनाई भी होती है। इसका उदाहरण महाराष्टड्ढ्र है। महाराष्टड्ढ्र में शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्टड्ढ्र नव निर्माण सेना आए दिन दूसरे प्रदेशों के लोगों का विरोध आंदोलन करती रहती है। उन्हें मराठी बोलने पर मजबूर करती है। इससे वहां के विकास में सहयोगी दूसरे प्रदेशों के लोगों का जीवन दूभर हो गया है। महाराष्टड्ढ्र में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पूरे देश के छात्र जाते थे, लेकिन वहां बहारी छात्रों का विरोध होने से अब दूसरे प्रदेशों के छात्रो का जाना कम हो गया है। तेलंगाना के बाद अब और नए राज्यों के गठन की मांग उठी। महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिमी बंगाल में गोरखालैंड, पूर्वाेत्तर में बाडोलैड तथा उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश, बुलंदेखण्ड और पूर्वांचल की मांग पहले से हो रही है। अब इन नए प्रदेशों को बनाने की मांग को लेकर आंदोलन तेज होंगे। एनडीए शासन में तीन नए प्रदेश छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड बने थे। अब नए राज्यों की मांग को लेकर नए-नए क्षेत्रीय और भाषाई समीकरण और संगठन बनेंगे। आंदोलनों का दौर शुरू हो जाएगा। इससे प्रदेशो में विकास की गति रूकेगी। नए प्रदेशों की मांग देश में एक नई उथल पुथल पैदा कर सकती है। तेलंगाना के बाद अब नए प्रदेशों की मांग को नकारा नहीं जा सकता। इसलिए अब आवश्यकता है एक नए राज्य पुर्नगठन आयेाग की। यह आयोग नए प्रदेशों की मांगों पर अध्ययन कर नए प्रदेशों के गठन की संस्तुति करें, लेकिन इस आयोग को केवल भाषा और राजनीतिक आधार के साथ-साथ प्रशासनिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखकर ही नए प्रदेशों की संस्तुति करनी चाहिए। पूर्व में जो छोटे प्रदेश बने है, उनमें से अनेक आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण केन्द्र के मोहताज बने हुए है। 

(लेखक राजकुमार गर्ग वरिष्ठ पत्रकार हैं। श्री गर्ग समय-समय पर सम-सामयिक विषयों पर आलेख लेखन का कार्य पूरी निष्ठा के साथ निष्पादित करते हैं।)

मां भारती के सच्चे सपूत थे राजेन्द्र बाबू


भारत के प्रथम राष्ट्रपति: डॉ राजेंद्र प्रसाद पुण्यतिथि पर विशेष 
डॉ शुचि प्रज्ञा शर्मा 
भारत माँ के अमर सपूत, बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई नामक गाँव में अवतरित होकर देश को धन्य कर दिया। बिहार की धरती जो भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, संत कबीर आदि के कर्मों की साक्षी रही है, एक और महापुरुष को अपने आँचल में पाकर सुवासित और गौरवांवित हो गई। अपने लाल का तेजस्वी मुख-मंडल देखकर धर्मपरायण माँ श्रीमती कमलेश्वरी देवी फूले न समाईं और पिता श्री महादेव सहाय जो संस्कृत एवं फारसी के मूर्धन्य विद्वान थे अपनी विद्वता पर नहीं पर अपने लाल को देखकर गौरवांवित हुए।
प्रखर बुद्धि तेजस्वी बालक राजेन्द्र बाल्यावस्था में ही फारसी में शिक्षा ग्रहण करने लगा और उसके पश्चात प्राथमिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल में नामांकित हो गया। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे टी के घोष अकादमी पटना में दाखिल हो गए। 18 वर्ष की आयु में युवा राजेन्द्र ने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया एवं 1902 में कोलकाता के ही नामचीन प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ाई शुरु की। इसी प्रेसीडेंसी कालेज में परीक्षा के बाद बाबू राजेंद्र की उत्तर-पुस्तिका की जाँच करते समय परीक्षक ने उनकी उत्तर-पुस्तिका पर ही लिखा कि श्श्ज्ीम मगंउपदमम पे इमजजमत जींद जीम मगंउपदमत.श्श् (परीक्षार्थी, परीक्षक से बेहतर है।) बाबू राजेंद्र की विद्वता की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है। बाबू राजेन्द्र की प्रतिभा दिन पर दिन निखरती जा रही थी और 1915 में उन्होंने विधि परास्नातक की परीक्षा स्वर्ण-पदक के साथ हासिल की। इसके बाद कानून के क्षेत्र में ही उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि भी हासिल की।
पारंपरिकतावाद के चलते 12 वर्ष की कच्ची उम्र में ही यह ओजस्वी किशोर राजवंशी नामक कन्या के साथ परिणय-बंधन में बँध गया । ऐसा माना जाता है कि 65-66 वर्ष के वैवाहिक जीवन में मुश्किल से लगभग 4 साल तक ही यह महापुरुष अपनी अर्धांगनी के साथ रहा और बाकी का जीवन अपनी माँ भारत माता के चरणों में, मानव सेवा में समर्पित कर दिया।
भारत माता का यह सच्चा सेवक अपनी माँ को फिरंगियों के हाथों की कठपुतली होना भला क्यों देख सकता था। इस महान मातृभक्त ने माँ भारती के बेडि़यों को काटने के लिए, उसे आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कंधे से कंधा मिलाने लगा और वकालत करते समय ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपने को झोंक दिया। यह महान व्यक्ति महात्मा गाँधी के विचारों, देश-प्रेम से इतना प्रभावित हुआ कि 1921 में कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर के पद को लात मार दिया और विदेशी और स्वदेशी के मुद्दे पर अपने प्रखर बुद्धि पुत्र मृत्युंजय को कोलकाता विश्वविद्यालय से निकालकर बिहार विद्यापीठ में नामांकन कराकर एक सच्चे राष्ट्रप्रेमी की मिसाल कायम कर दी। इस अविस्मरणीय एवं अद्भुत परित्याग के लिए भारती-पुत्र सदा के लिए स्वदेशीयों के लिए अनुकरणीय एवं अर्चनीय बन गया। गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन को सफल बनाने के लिए इस देशभक्त ने भी बिहार में असहयोग आन्दोलन की अगुआई की और बाद में नमक सत्याग्रह आन्दोलन भी चलाया।
देश सेवा के साथ ही साथ राजेन्द्र बाबू मानव सेवा में भी अविराम लगे रहे और 1914 में बिहार एवं बंगाल में आई बाढ़ में उन्होने बढ़चढ़कर लोगों की सेवा की, उनके दुख-दर्द को बाँटा और एक सच्चे मनीषी की तरह लोगों के प्रणेता बने रहे। राजेंद्र बाबू का मानव-प्रेम, का उदाहरण उस समय सामने आया जब 1934 में बिहार में आए भूकंप के समय वे कैद में थे पर जेल से छूटते ही जी-जान से भूकंप-पीडि़तों के लिए धन जुटाने में लग गए और उनकी मेहनत, सच्ची निष्ठा रंग लाई और वाइसराय द्वारा जुटाए हुए धन से भी अधिक इन्होनें जुटा दिया। अरे इतना ही नहीं माँ भारती का यह सच्चा लाल मानव सेवा का व्रत लिए आगे बढ़ता रहा और सिंधु एवं क्वेटा में आए भूकंप में भी भूकंप पीडि़तों की कर्मठता एवं लगन के साथ सेवा की एवं कई राहत-शिविरों का संचालन भी किया।
इस महान विभूति के कार्यों एवं समर्पण से प्रभावित होकर इन्हें कई सारे पदों पर भी सुशोभित किया गया। 1934 में इन्हे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुना गया। इन्होंने दो बार इस पद को सुशोभित किया। भारतीय संविधान के निर्माण में भी इस महापुरुष का बहुत बड़ा योगदान है। उनकी विद्वता के आगे नतमस्तक नेताओं ने उन्हें संविधान सभा के अध्यक्ष पद के लिए भी चयनित किया। बाबा अंबेडकर को भारतीय संविधान के शिल्पकार के रूप में प्रतिस्थापित करने में इस महान विभूति का ही हाथ था क्योंकि यह महापुरुष बाबा अंबेडर के कानूनी विद्वता से परिचित था। स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में इसने कार्यभार संभाला और अपनी दूरदृष्टि एवं विद्वता से भारत के विकास-रथ को विकास मार्ग पर अग्रसर करने में सहायता की। यह महापुरुष सदा स्वतंत्र रूप से अपने पांडित्य एवं विवेक से कार्य करता रहा और कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों का हनन नहीं होने दिया।
इस महापुरुष के चाहनेवालों में पूरे भारतीय थे। इनकी लोकप्रियता लोगों के सिर चढ़कर बोलती थी।इन्होंने २६ जनवरी १९५० को भारत के प्रथम राष्ट्रपति का पदभार सम्भाला। इसका ज्वलंत उदाहरण यह है कि पंडित नेहरू डा. राधाकृष्णन को राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहते थे पर बाबू राजेंद्र प्रसाद के समर्थन में पूरे भारतीय समाज को देखकर वे चुप्पी साध लिए थे। जब 1957 में पुनः राष्ट्रपति के चयन की बात उठी तो चाचा नेहरू ने दक्षिण भारत के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर अपनी यह मंशा जाहिर की कि इसबार कोई दक्षिण भारतीय को ही राष्ट्रपति बनाया जाए पर दक्षिण भारतीय मुख्यमंत्रियों ने यह कहते हुए इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि जबतक डा. राजेन्द्र प्रसाद हैं तबतक उनका ही राष्ट्रपति बने रहना ठीक है और इस प्रकार राजेन्दर बाबू को दुबारा राष्ट्रपति मनोनीत किया गया। 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के पद को सुशोभित करने के बाद सन 1962 में उन्होंने अवकाश ले लिया। इस महापुरुष की सादगी, समर्पण, देश-प्रेम, मानव-प्रेम और प्रकांड विद्वता आज भी लोगों को अच्छे काम करने की प्रेरणा प्रदान करती है। इस महान भोजपुरिया को सर्वोच्च भारतीय नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया।
इस महापुरुष ने 1946 में अपनी आत्मकथा लिखने के साथ ही साथ कई अन्य चर्चित एवं पठनीय पुस्तकों की रचना भी की जिसमें बापू के चरणों में, गाँधीजी की देन, भारतीय संस्कृति, सत्याग्रह एट चंपारण, महात्मा गाँधी और बिहार आदि विचारणीय हैं।पूरी निष्ठा से देशसेवा करते हुए भारत रत्न राजेंद्र बाबू ने भारत माँ से अवकाश माँगा। उनका निधन २८ फरवरी १९६३ को हो गया। ऐसे महान सपूत भारत माँ को अत्यंत प्रिय हैं। विश्व ऐसी विभूति के पुनरागमन की शुभेच्छा करता है। इसी शुभ भाव से आज उस देशरत्न को हम श्रध्दांजलि अर्पित कर रहे हैं।

(उपर्युक्त लेख में लेखिका डॉ शुचि प्रज्ञा शर्मा के स्वयं के विचार हैं।

आरक्षण: राजनीतिक सत्ता में सामाजिक सहभागिता का सवाल

देवेन्द्र कुमार
आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बाहर निकलता दिख रहा है। इस बार इसे बाहर निकालने का श्रेय जाता है कांग्रेसी प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी को। अपने हालिया व्यक्तव में जनार्दन द्विवेदी ने इसे आर्थिक आधार पर लागू करने का सुक्षाव दिया है। लगे हाथ योग-संतई छोड, राजनीति में अपनी किस्मत आजमा, अपने अंह को सन्तुष्टि दे रहे बाबा राम देव ने भी इसका समर्थन कर दिया और इसके साथ ही इसके-पक्ष विपक्ष में गोलबन्दियां तेज हो गई।
आरक्षण विरोधियों का नया तर्क इसकी उपादेयता को ले कर है। उनका कहना है कि आरक्षण से आरक्षित जातियों का कल्याण नहीं हो रहा है। आरक्षित जातियों की आर्थिक बदहाली इससे दूर नहीं हो रही, लगे हाथ वह यह भी जोड़ रहे है कि सवर्ण जातियों में भी आर्थिक वंचना है।
निष्चित रुप से आरक्षण वंचित जातियों में आर्थिक समृद्धि नहीं ला सका और यह बात भी सच है कि सवर्ण जातियों में भी आर्थिक वंचना है। पर सवाल यह है कि क्या आरक्षण गरीबी-फटेहाली दूर करने का संवैधानिक उपकरण है। क्या यह विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों की तरह गरीबी उन्मुलन का एक कार्यक्रम है। क्या इसी उद्देष्य को दृष्टिगत रख कर बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर ने इसे सामने लाया था। आरक्षण तो राजनीतिक सत्ता में सामाजिक सहभागिता को सुनिष्चित करने का उपकरण भर है, इसे विषेष अवसर का सिन्द्वात कहा गया, नाकारात्मक नहीं साकारात्मक विभेद कहा गया और इसीलिए इसका आधार सामाजिक-षैक्षणिक वंचना को बनाया गया। हजारों बरसों से बहुसंख्यक जातियों को जातीय आधार पर सामाजिक-षैक्षणिक वंचना का षिकार होना पड़ा, मान-सम्मान और संपदा के अधिकार से महरुम होना पड़ा और दूसरी तरफ सिर्फ जन्मना-जातीय आधार मुठी भर जातियों को विशेषाधिकार प्राप्त रहा। क्या उन वंचित जातियों का राजनीतिक सत्ता में सुदुढ़ीकरण करने के लिए उपचारात्मक औजार के बतौर प्रयुक्त हो रहा आरक्षण प्राकृतिक-सार्वभौमिक न्याय के विपरीत है। क्या हजारों बरसों से एक साजिष के तहत राजनीतिक सत्ता से वंचित किये गये जातियों का राजनीतिक-सामाजिक प्रबलीकरण हो गया। क्या राजनीतिक-सामाजिक सत्ता में उनकी सांख्यकीय भागीदारी पूरी हो गई।
सच्चाई यह है कि उदारीकरण, निजीकरण और वैष्वीकरण का त्रैय ने आरक्षण की अभिधारणा में चुना पहले ही लगा दिया है। जिन सरकारी नौकरियों को लेकर बबाल काटा जा रहा है। वह तो उदारीकरण, निजीकरण और वैष्वीकरण की भेंट चढ़ चुकी है। और आज की जरुरत तो निजी क्षेत्र में आरक्षण की है। अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी चर्चा की थी, पर  वह परवान चढ़ नहीं सका।
    कुछ समालोचकों की पीड़ा पिछड़ी जातियों का आरक्षण का लेकर ह। पिछड़ों के लिए आरक्षण की चर्चा अम्बेडकर ने संविधान निर्माण के दौरान ही की थी और तब भी नेहरु और राजेन्द्र प्रसाद ने इसका पूरजोर विरोध किया था। तब एक रणनीति के तहत सरदार पटेल ने डा0 अम्बेदकर से पूछा था कि ‘ओबीसी‘ कौन है। तब तक ओबीसी को संवैधानिक रुप से परिभाषित नहीं किया गया था। इसी परिप्रेक्ष्य में लाचार होकर डा0 अम्बेडकर ने संविधान में धारा 340 को सम्माहित कर दिया। धारा 340 के तहत यह राज्य सरकार की जिम्मेवारी है कि वह ‘ओबीसी‘ की पहचान करे। सरकार गठन के बाद अपनी संवेदनषीलता और समाजवादी झुकाव के लिए प्रचारित प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु के द्वारा बेहद दुखी मन से काका कालेकर को यह जिम्मेवारी सौंपा गया कि वे ‘ओबीसी‘ की पहचान करें। पर जैसा की तय था, काका कालेकर आयोग की  सिफारिषों को कुड़ेदान में डाल दिया गया। जनता पार्टी के घोषणा पत्र में इसकी अनुषंसाओं  को लागू करने का वादा किया गया था। पर प्रधानमंत्री मोरारजी देषाई ने इस अनुषंसा को पुराना बतला कर नये सिरे से वीपी मंडल के नेतृत्व में मंडल आयोग का गठन कर दिया। स्पष्ट है कि इस मामले को टालने की एक और कोषिष की गई।
1984 में मंडल आयोग की रिपोर्ट आ गई, इस बीच इंदरा गांधी की सत्ता में वापसी हो गई थी। इधर पिछड़ी जातियों में जागरुकता का स्तर भी बढ़ा। मंडल आयोग की अनुषंसा को लागू करने का जोर बढ़ने लगा। और तब पिछड़ों में आई सामाजिक सचेतना को विखंडित करने के लिए विष्व हिन्दु परिषद की ओर से ‘एकता यात्रा‘ निकाली गई। इस बात को जोर-षोर से प्रचारित किया गया कि इसकी अनुषंसा से भारतीय समाज की सामाजिक समरसता भंग जायेगी, हजारों बरसों से स्थापित सामाजिक ताना-बाना बिखर जायेगा। कांग्रेस का भी मंडल के प्रति यही रुख था। यही कारण है कि जब यह ‘एकता यात्रा‘ दिल्ली पंहुची तो उसका स्वागत करने वालों में एक इन्दरा गांधी भी थीं। पर यह ‘एकता यात्रा‘ पिछड़ों की राजनीतिक- सामाजिक सचेतना को कुंद नहीं कर पाई। अतंतः वीपी सिंह ने देवीलाल के काट के रुप में मंडल आयोग की सिफारिषों को लागू कर दिया, पर यहां भी एक चाल चली गई। आरक्षण नौकरियों में दिया गया, षिक्षा में नहीं। यह भी एक साजिष थी। सामाजिक अभिजनों की यह साजिष मनुस्मृति का अनुपालन की थी। मनुस्मृति कहती है कि षुद्रों को षिक्षा मत दो। षासकीय सामाजिक अभिजन कहता है कि उच्च षिक्षा के लिए मेरे पास पैसा नहीं है। षिक्षा प्राप्त करनी है तो मोटी रकम का भुगतान करो, जो सामाजिक-षैक्षणिक वंचितो के पास है ही नहीं। इस प्रकार राजनीतिक सामाजिक अभिजनों की भाषा बदली हुई है, पर उद्देष्य वही है। यद्धपि बाद में षिक्षा में आरक्षण का मामला हल हो गया। याद रहे कि, मंडल की अनुषंसा लागू होते ही बाबरी मस्जीद को गिराने की तैयारी षुरु कर दी थी। दरअसल, यह मंडलवादी एकता को कमजोर कर, उसे डायर्वट करने का एक वृहद आयोजन भर था, पर मंडलवादी एकता इससे कमजोर नहीं हुई। आज भाजपा मन्दिर मुद्दे के आस -पास भटकना भी नहीं चाहती ,तो उसके कारण स्पष्ट है।
आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान करने की जो योजना भाजपा और कांग्रेस के द्वारा बनाई जाती रही है, वह अकारण नहीं है। दरअसल यह आरक्षण की अभिधारणा में ही चूना लगाने की एक दूरगामी चाल है। आरक्षण को समाप्त करने के लिए एक मानसिक और सामाजिक वातावरण तैयार किया जाता रहा है। संविधान में उल्लेखित सामाजिक-षैक्षणिक मापदंडों की जानबूझकर चर्चा नहीं की जाती। और एक साजिष के तहत विष्लेषकों के द्वारा इसे गरीबी दूर करने के उपकरण के रुप में प्रचारित-प्रसारित किया जाता रहा है।
और अब कांग्रेस, भाजपा को तो एक नया सहयोगी भी मिल गया है। आरक्षण  का आधार आर्थिक करने का सुक्षाव भले ही जनार्दन द्विवेदी की ओर से आया हो पर आज आरक्षण का सबसे बड़ा विरोधी के रुप में अरविन्द केजरीवाल की टोली सामने आई है। नयी राजनीति के षिगूफे में बड़े ही यत्न और षलीके से प्रगतिषीलता का लबादा ओढ़ यह टोली आरक्षण की अभिधारणा को ही खारीज कर रहा है। कभी आरक्षण विरोध के नाम पर हुड़दंग करने वालो की पूरी फौज ‘मैं हूं आम आदमी‘ की टोपी पहन अब आरक्षण विरोध का नया हथियार खोज निकाला है। और यह चेहरा प्रगतिषीलता और नई राजनीति का लबादा ओढ़े होने के कारण न सिर्फ कांग्रेस-भाजपा दोनों से ही ज्यादा खतरनाक है वरन सामाजिक वंचितों को भी अपने साथ जोड़ने में सफल होता दिख रहा है।
आज जरुरत आरक्षण के आधार में बदलाव की नहीं वरन निजी क्षेत्रों में इसे लागू करने की है। आरक्षण के वर्तमान उपबन्धों का बेहतर कार्यान्वयन की है और वैसी वंचित जातियों को आरक्षण के अन्दर लाने की है जो हिन्दू धर्म की परिधि के बाहर है। क्योंकि दलित-वंचित जातियां चाहे किसी भी धर्म में हो, उनका सामाजिक वंचना में कोई परिर्वतन नहीं आया है। भले ही इसके लिए आरक्षण की वर्तमान सीमा को बढ़ाना पड़े। और आरक्षित पदों को जो एक साजिष के तहत खाली छोड़, और बाद में सामान्य कोटे से भर दी जाती है, उस पर विराम लगाने की है। यह बात बार-बार सामने आ रही है कि आरक्षित समूह से कोई उत्कृष्ट अंक भी लाता है तो उसे आरक्षण कोटे के अर्न्तगत दिखलाया जाता है। कायदे से उसे सामान्य कोटे के अर्न्तगत आना चाहिए। पर नयी राजनीति का दावा करने वाले आरक्षण की विफलता को सामने लाने का दावा करते हैं पर इस साजिष पर अपनी जुबान नहीं खोलते। बेहद  जरुरी है कि एक कमीषन का गठन हो, जो आरक्षण के अनुपालन में ही रही गड़बडि़यों की जांच करे, धर्मान्तरित वंचितो को इसके दायरे में लाये और निजी क्षेत्र में आरक्षण का कार्यान्वयन कैसे हो, इसका मार्ग प्रषस्त करे।

Thursday, 27 February 2014

हिन्दुस्तान को हिन्दुस्तान बनाये रखना ही सबसे बड़ी चुनौती


देश के पहले वामपंथी और प्रजातांत्रिक नेता थे सावरकर: डॉ शर्मा
डालर साम्राज्यवाद के शिकार हो रहा है हिन्दुस्तान: शैलेन्द्र दुबे 

अतुल मोहन सिंह 
लखनऊ. समान उद्देश्य, समान लक्ष्य और समान रास्ते होने के बावजूद भी हम सभी लोग आगे पीछे चल रहे हैं. मुझे आपस में एकता के भाव को विकसित करने की बहुत ही महती आवश्यकता है. उक्त विचार सनातन ब्रह्म फाउंडेशन उत्तर प्रदेश की ओर से महान क्रांतिकारी वीर सावरकर की पुण्यतिथि तथा चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर आयोजित विचार संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए व्यक्त किये. 
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि दैनिक अवध दर्पण के संपादक और प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य डॉ अजय दत्त शर्मा ने अपने गंभीर उद्द्बोधन में कहा कि हिन्दुस्तान पर कुछ लोगों ने लगभग एक हजार वर्षों तक इसको गुलाम बनाकर रखा. हम लगातार अहिंसावादी सोच की अति का शिकार बनते रहे. ईस्ट इंडिया कम्पनी के नाम पर कब्जा किया गया. केरल के राजा ने इस कम्पनी के अधिकारियों को सबसे पहले शरण दी उसी ने वहां पर अपने राजकोष का इस्तेमाल देश में पहली मस्जिद बनाने में किया न सिर्फ जगह दी बल्कि संसाधन भी मुहैया कराए. कालान्तर में केरल में ही पहला विदेशी चर्च भी निर्मित हुआ था. हमने विदेशी व्यापारियों का ट्रिक रिकार्ड जांचे बिना ही उनको अपने यहां व्यापार करने की इजाजत दी थी. स्क्रीनिंग करवाना भी कुछ अधूरा सा लगता है क्योंकि हम इस बात में पूर्ण विशवास रखते हैं कि हमें मानव योनि मिलने से पहले ही हमारी ईश्वर ने खुद ही स्क्रीनिंग करके भेजा है. हम क्या सिर्फ आर्थिक एजेंडे पर चलकर ही मानव को मानव बनाकर रख सकते हैं हम आज एक शब्द की गलतफहमी दूर करना चाहते हैं. हुतात्मा और शहीद में बड़ा फर्क होता है वीर सावरकर और चद्रशेखर आज़ाद शहीद नहीं हुए थे बल्कि ये हुतात्मायें थीं. इन्होने जान बूझकर अपना प्राणोत्सर्ग किया था. हिन्दू शब्द साम्प्रदायिक नहीं है यह विभिन्न प्रकार से प्रमाणित हो चुका है. जो भी व्यक्ति इसे अपनी पुण्यभूमि अर्थात पुरखों की भूमि मानता है, परम्परा की भूमि, आस्था की भूमि, मानता है वह सब हिन्दू हैं. हमारी चेतना की राजधानी लाहौर, मानसरोवर, लंका, नेपाल, भूटान, वर्मा, म्यांमार का निवासी सौ साल पहले हिन्दुस्तानी होता था. दूसरा जो भी नागरिक इसे अपनी मातृभूमि मानते हैं वो भी हिन्दू हैं. वीर सावरकर ने कहा कि हिन्दुओं का सैनिकीकरण होना चाहिए. हम शास्त्र और सस्त्र साथ-साथ लेकर चलने की परम्परा के संवाहक हैं. राजनीति का हिन्दूकरण होना चाहिए. मतलब राजनीति का शुद्धिकरण किया जाय. उसमें सामर्थ्य और नैतिक ताकत पैदा करनी होगी. हमारे विरोधियों ने जहां मातृभूमि शब्द जैसी कोई अवधारणा नहीं है. वह हम लोगों को बरगलाने का काम कर रहे हैं.अगर वन्दे मातरम् की प्रतिष्ठा नहीं होगी, तो इन हुतात्माओं के बलिदान का कोई अभिप्राय नहीं है. हमने किसी क्रांतिकारी को नहीं बल्कि देश के एक रईस को सत्ता सौपी. गांधीजी के कई बार कड़े अनुरोध के बावजूद भी हम कांग्रेस को खत्म करने के स्थान पर पोषण करने का काम किया है. 
उन्होंने आगे कहाकि सुखदेव राज, आनंद भवन जाकर नेहरू से मिलकर भगत सिंह को आजाद करवाना चाहते थे लेकिन इसका उलटा हो गया. इस वर्ग अंग्रेजों का चरण बंदन करके, विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों को भारतीय सैनिकों के रूप में मदद करके, असहयोग आन्दोलन चलाकर आज़ादी हासिल करना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए खिलाफत आन्दोलन का नाटक पूरे देश में कांग्रेस को मजबूत करने के नाम पर फैलाया. हमने दो विदेशियों को इस कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाया. आज मेला लगता है नये बनाये गए घाटों पर शहीदों के घात तो बेजार से पड़े हैं. गांधीजी ने अपनी वसीयत में लिखा था कि मेरी चिता की मिट्टी को भारत पाक की सभी नदियों में समान रूप से प्रवाहित करना इस आशय का पत्र जब भारत सरकार ने पाकिस्तान की कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह को लिखा तो उन्होंने इसके जवाब में कहा था कि गांधी आदमी तो ठीक था पर था काफिर लिहाजा हम किसी काफिर की मिट्टी पाक की पाक नद्यों में नहीं बहाने देंगे. वहीं दूसरी ओर पंडित गोडसे ने भी अपनी वसीयत में लिखा था कि मेरी मिट्टी को तब तक मेरे पुणे स्थित घर में सुरक्षित रखना जब तक कोई मान भारती का कोई सपूत फिर से in टुकड़ों में बट चुकी मां भारती को फिर से अखंड भारत न बना दे. आज भी गोडसे की अस्थियाँ देश में कोई सपूत पैदा होने का इन्तजार कर रही हैं. वीर सावरकर ने भी खुद ही अपना शरीर त्याग किया था. दो अलग-अलग बातें हैं वीरगति प्राप्त करना और विजेता होना दोनों में बड़ा फर्क होता है. दोनों ही विचारकों के विचार वामपंथी थे और पूर्ण प्रजातांत्रिक भी. मजदूर संगठन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, रत्नागिरी में खुद बनवाये गए मंदिर में योग्य दलित की नियुक्ति जैसी कुछ मूलभूत चीजें हैं जो उनको वामपंथी साबित करती हैं. उन्होंने वृहद स्तर पर सुद्धि आन्दोलन चलाया था. सावरकर भी अधूरी आज़ादी से असंतुष्ट थे. भारत सरकार ने गांधीजी का पोस्टमार्टम कराना ही भूल गई थी. गांधीजी की मौत गोडसे द्वारा चलाई गई गोली लगने से नहीं हुई ठी बल्कि जैसे ही उन्होंने सामने रिवाल्वर देखा उनको ह्रदयाघात हो गया और जिसमे उनकी मौत हो गई थी. गोडसे पर क्रांतिकारी बनने का भुत सवार था और उन्होंने खुद ही स्वीकार किया कि गांधीजी की मौत मेरी ही गोली से हुई है. गोडसे ने सावरकर से कहा था कि जब तक लालकिले पर भगवा ध्वज नहीं लगेगा तब तक इस देश की आज़ादी अधूरी रहेगी जबकि सावरकर तिरंगा और भगवा दोनों ध्वजों को साथ-साथ प्रयोग करने की नीति पर तैयार हो गए थे. हिन्दुस्तान को हिन्दुस्तान बनाकर रखना ही वर्तमान समय की सबसे बड़ी मांग है. 
विशिष्ट अथिति के रूप में मौजूद रहे प्रख्यात चिन्तक, मजदूर नेता और समाजसेवी शैलेन्द्र दुबे ने अपने संबोधन में कहा कि गांधीजी हत्याकांड में सावरकार को भी अभियुक्त बनाया गया था जिसमे सर्वोच्च न्यायालय से उनको बरी घोषित किया गया था. ग़दर शब्द की उत्पत्ति गद्दारी से हुई ठी जबकि वह कुछ सिपाहियों की ओर से किया गया ग़दर नहीं था बल्कि एक स्वतंत्रता आन्दोलन का सशत्र विद्रोह था इस बात को भी वीर सावरकर ने पहली प्रमाणिक पुस्तक लिखकर स्पष्ट किया था. काशी षणयन्त्र केश में शचीन्द्र नाथ सान्याल को भी आरोपी बनाया गया था. उनके बारे में बड़ी बड़ी आश्चर्यजनक उपलब्धियां दर्ज हैं. उनकी संगठन क्षमता के बारे में देखिये कि इस ही दिन में एक ही समय पर अफगान से लेकर रंगून से पचे बांटे गए थे. कुछ लोगों की गद्दारी से उनको भी जेल जाना पडा था. रंजीत नाथ सान्याल जो उनके पुत्र थे उनको दो साल तक इंजीनियरिंग की डोगरी रहने के बावजूद भी नौकरी नहीं मिली थी. 47 में देश आज़ाद होने की बाद उनको नौकरी मिल सकी. उनकी पत्नी प्रतिभा सान्याल ने मुम्बई के सश्त्रागार कू लूटने का काम किया था. in सभी क्रांतिकारियों के गुरू थी वीर सावरकर. बाल गंगाधर तिलक से पहले ही उन्होंने पूर्ण स्वराज्य की बात कही थी. चंद्रशेखर आज़ाद बदरका उन्नाव के नहीं थे कानपुर में भौती स्थान है वहां पर उनके परदादा रहा करते थे. 23 जुलाई, 1923 को ही उनका जन्म झाबुआ मध्यप्रदेश में हुआ था. उन्होंने आगे कहाकि अमेरिकापरस्त देशों में लोग दाहिनी ओर से चलते हैं जो भी बाईं ओर चलने का प्रयास करता है वह वामपंथी है. अर्थात बनी बनाई पद्धति पर और लकीर लांघकर बाहर निकलने वाले लोग ही वामपंथी कहलाये. रामरखा मॉल ने जनेऊ के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था अंडमान की सेन्ट्रल जेल में उसके बाद सावरकार जी ने वहां के सभी कैदियों को बिना जाति का विभेद किये ही सभी को जनेऊ धारण करवाया था इस तरह से सावरकर पहले वामपंथी थे. आज़ाद ने देश में पहली बार सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी इसका मुख्यालय कानपुर स्थित एक बन में था. आज उसी कानपुर में आज़ाद विश्विद्यालय के सामने आंबेडकर की मूर्ती स्थापित है. लोहिया ला विश्वविद्यालय में भी आंबेडकर प्रतिमा स्थापित है. सुखदेव राज पंचमढ़ी में एक कुष्ठ रोगियों की सेवा का आश्रम संचालित करते थे उसी आश्रम में उनका भी देहावसान हुआ था. आज़ाद का सपना था कि लाहौर जेल तोड़कर भगत सिंह को आज़ाद कराया जाय जो अधूरा ही रह गया. उभोने अल्फ्रेड पार्क से सुकदेव राज को जबरन बाहर निकाल दिया था ताकि कम से कम उनकी जान बच जाय उनकी मौत सन्निकट है ऐसा उनको आभास हो गया था. आज़ाद की मौत की खबर सुनकर भगत सिंह पूरी तरह से टूट गए थे. सूरज निकलने से पहले घनघोर कालिमा होती है. सशत्र क्रान्तिवादियों की पूरी व्यूह रचना आज़ाद खुद ही करते थे. 
उन्होंने आगे कहा कि क्या यही सपना देखा था इन बलिदानियों ने कि देश जाति में इस कदर बांटा दिया जाएगा. वह एक शब्द में कहना चाहते थे कि मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण नहीं किया जाएगा. आज न्यूक्लीयर करार हमने अमेरिका के हित साधने के लिए किया है जो रिएक्टर अमेरिका खुद इस्तेमाल नहीं करता है उनको ही हम खुद उससे खरीद रहे हैं. आज हम आर्थिक रूप से अमेरिका के गुलाम हो चुके हैं. 1 अप्रैल, से प्राकर्तिक गैस के दाम हम डालर में भुगतान करेंगे. हम डालर साम्राज्यवाद के शिकार हो रहे हैं. डालर से बिजली, पानी, उर्वरक, परिवहन, घरेलू गैस और खाद्द्यान बिकने जा रहा है. जाहिर सी बात है कि इस डील में तो उसी का फायदा होगा जिसकी मिदरा होगी सिक्का तो अमेरिका का ही मजबूत कर रहे हैं हम. परिणामी ज्येष्ठता और पदोन्नति में प्रोन्नति के लिए संविधान संशोधन करवाया था रामराज ने अटल बिहारी बाजपेयी सरकार से मिलकर आज वही रामराज डॉ उदुत्राज बनकर फिर से बीजेपी का साथ देने जा रहे हैं. एक व्यक्ति के पास दस लाख करोड़ की संपत्ति है वह है अम्बानी बन्धु. आम आदमी को सरकार जो देती है उसे अनुदान कहा जाता है और अमीर आदमी को जो देती है उसे इंसेंटिव कहा जाता है. सावरकर ने जो लड़ाई लड़ी थी वह जनता के लिए थी आज की लड़ाई कार्पोरेट के लिए हो रही है. बहुत कभी परिवर्तन नहीं लाता है बल्कि समर्पित अल्पसंख्यक ही परिवर्तन ला सकते हैं. महाशिव ही असली समाजवादी हैं जिनके प्रति हमारी निष्ठा सदैव बनी रहेगी. 
इस अवसर पर संगठन के अध्यक्ष अशोक कुमार पाण्डेय, प्रदेश अध्यक्ष अजय तिवारी, दीनू बाजपेयी, प्रेम शंकर ओझा, आर के शर्मा, गोपाल नारायण बाजपेयी, प्रेम नारायण तिवारी तथा आनंद कुमार ने भी अपने विचार व्यक्त किये.

हत्यारों पर रहम कैसी देशभक्ति है

अरविंद जयतिलक
सर्वोच्च अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई पर रोक लगाकर तमिलनाडु सरकार की कुत्सित राजनीति पर पानी फेर दिया है। अदालत ने रिहाई के खिलाफ दाखिल केंद्र सरकार की अर्जी पर सुनवाई करते हुए जयललिता सरकार को ताकीद किया है कि वह रिहाई के मामले में यथास्थिति बनाए रखे। बता दें कि सर्वोच्च अदालत द्वारा दया याचिका निपटाने में देरी के आधार पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारों मुरुगन, सांतन और पेरारिवलन की फांसी उम्रकैद में तब्दील किए जाने के एक दिन बाद ही तमिलनाडु सरकार ने वोटयुक्ति की लालसा में सभी हत्यारों को रिहा करने का निर्णय लिया और सारे नियमों को दरकिनार कर केंद्र सरकार को पत्र भी लिख डाला कि वह तीन के दिन भीतर हत्यारों की रिहाई की मंजूरी दे अन्यथा राज्य सरकार खुद रिहाई का आदेष दे देगी। गौरतलब है कि इस विशम स्थिति से निपटने के लिए केंद्र की ओर से उच्चतम न्यायालय में सॉलिसिटर जनरल मोहन परासर ने रिहाई पर रोक लगाने का अनुरोध किया। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि चूंकि दोशियों को षस्त्र अधिनियम व विस्फोटक अधिनियम जैसे केंद्रीय कानूनों में सजा सुनायी गयी है लिहाजा इन मामलों में माफी का अधिकार राज्य को नहीं है। इस पर सिर्फ केंद्र ही फैसला कर सकता है। 

अदालत ने स्पश्ट कहा है कि मौत की सजा उम्रकैद में तब्दील होने का मतलब दोशियों की रिहाई नहीं है। लेकिन कहते हैं न कि राजनीति मौके की मोहताज होती है और सियासतदान इससे चुकते नहीं हैं। जयललिता सरकार ने भी कुछ ऐसा ही किया। बहरहाल वह अपने निर्णय को अमलीजामा पहनाती इससे पहले ही सर्वोच्च अदालत ने उसके हाथ-पांव बांध दिए। सच तो यह है कि अदालत न हो तो सरकारें निरंकुष होकर कब राश्ट्रीय हितों को बलि चढ़ा दे, पता ही न चले। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां आतंकवाद जैसे संगीन मसले पर तमिलनाडु सरकार को धैर्य व संवेदना का परिचय देना चाहिए वह घृणित राजनीति पर उतारु है। उसका कृत्य रेखांकित करता है वह वोटयुक्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। अगर सर्वोच्च अदालत द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया गया जाता तो निष्चय ही वह हत्यारों की रिहाई हो जाती और यह अनर्थ ही नहीं होता बल्कि एक किस्म से हत्या और हत्यारों का महिमामंडन भी होता। यह देष के लिए लज्जाजनक है कि पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारे न केवल मौत की सजा से बच निकले बल्कि अब उनकी रिहाई के भी प्रयास हो रहे हैं। लेकिन इसके लिए सिर्फ जयललिता ही अकेली दोशी नहीं हैं। कांग्रेस पार्टी भी बराबर की गुनाहगाार है। एक अरसे से केंद्र में उसकी सरकार है लेकिन षायद ही कभी देखा गया हो कि वह दया याचिकाओं को निपटाने को लेकर गंभीर रही हो। विपक्ष जब भी आतंकवाद से जुड़े आतंकियों के दया याचिकाओं को षीध्र निपटाने को लेकर अपना कड़ा रुख अख्तियार किया कांग्रेस पार्टी राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका का बहाना बनाकर अपना बचाव करती रही।

आखिर इसे उचित कैसे ठहराया जा सकता है। लेकिन चूंकि इस खेल में कांग्रेस का राजनीति सधता था इसलिए गलत नहीं माना। अब वह राग-प्रलाप कर तमिलनाडु सरकार के निर्णय की भर्त्सना कर रही है तो यह भी एक किस्म से सियासत ही है। सच तो यह है कि अगर वह पहले ही इस मसले पर अपनी सक्रियता दिखायी होती और दया याचिकाओं का निपटारा के प्रयास तेज किए होते तो आज हत्यारे फांसी से बच नहीं निकलते और न ही जयललिता को उनकी रिहाई का मौका मिलता। राहुल गांधी का यह कहना सही हो सकता है कि यदि कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री की हत्या करे और रिहा कर दिया जाए तो किसी आम आदमी को इंसाफ कैसे मिलेगा? लेकिन भोथरे हो चुके इस दलील का उत्तर उन्हें अपनी पार्टी के अंदर ही ढुंढना चाहिए। इसलिए कि इसका उत्तर कांग्रेस के सियासत में ही छिपा है। देष-दुनिया को अच्छी तरह पता है कि इस मसले पर कांग्रेस ने कम सियासत नहीं की है। देष यह भी देख चुका है कि वह वोटयुक्ति और सत्ता को बचाने के लिए किस तरह जयललिता और एम करुणानिधि के आगे नतमस्तक रही। किस तरह सोनिया गांधी ने राजीव गांधी की हत्या में षामिल नलिनी की फांसी को उम्रकैद में बदलवाया और प्रियंका गांधी उनसे मुलाकात की क्या किसी से छिपा है? क्या यह सच नहीं है कि कांग्रेस ने 1997 में गुजराल सरकार से सिर्फ इसलिए समर्थन वापस ले लिया कि जैन आयोग ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट डीएमके पर आरोप लगाया था कि उसने लिट्टे को संरक्षण दी? देष जानना चाहेगा कि फिर कांग्रेस ने 2004 में डीएमके के सहयोग से सरकार का गठन क्यों किया? उचित होगा कि राहुल गांधी अपनी पार्टी और सरकार से सवाल करें कि उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों की दया याचिका को निपटाने में एक दषक से अधिक समय क्यों लगा? क्या वजह है कि कांग्रेस की दिलचस्पी राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी दिलाने के बजाए अपनी सत्ता बचाने में रही? तमिल मसले पर जिस तरह कांग्रेस इन दोनों दलों के आगे घुटने टेकती रही उसी का कुपरिणाम है कि आज इस मसले पर कुत्सित सियासत हो रही है। 

यह हकीकत है कि अगर मुख्यमंत्री जयललिता पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को रिहा करने के लिए आगे नहीं आती तो एम करुणानिधि इस मसले पर हत्यारों के साथ होते और राजनीतिक बवंडर खड़ा करते। वैसे भी जयललिता के फैसले पर सहमत होकर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि दोनों की सोच में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। देखा भी जा चुका है कि श्रीलंका में तमिलों के उत्पीड़न को लेकर संयुक्त राश्ट्र मानवाधिकार परिशद में अमेरिका द्वारा लाए जा रहे प्रस्ताव पर किस तरह उन्होंने मनमोहन सरकार को बंधक बनाकर घुटने टेकने पर मजबूर किया। अब जब उच्चतम न्यायालय ने हत्यारों की फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है और जयललिता राजनीतिक लाभ के लिए उनकी रिहाई की कोषिष कर रही हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ट्वीट कर कह रहे हैं कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और मासूम भारतवासियों के नेता के सात हत्यारों की रिहाई न्याय के सभी मूल्यों के खिलाफ होगी। यह रुदन गान ठीक नहीं। यह देष को भरमाने जैसा ही है। आतंकवाद पर उनकी सरकार की घुटनेटेक नीति का ही दुश्परिणाम है कि आज देष आतंकवाद की आग में झुलस रहा है और सियासतदान घृणित राजनीति पर उतारु हैं। उचित होगा कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ अपने अभियान को तेज करे और सभी राजनीतिक दल मिलकर दया याचिकाओं को षीध्र निपटाने का रोडमैप तैयार करें। यह उचित नहीं है कि कोई हत्यारा दो-ढाई दषक तक कारावास का दंड भोगे और फिर उसे मौत की सजा दी जाए। यह मानवता के खिलाफ होगा। लेकिन इसका तात्पर्य यह भी नहीं किी इसकी आड़ में कोई राजनीतिक दल वोटयुक्ति का घिनौना खेल खेले। आखिर यह किस तरह राश्ट्रभक्ति का पर्याय हो सकता है? 

खुद ही लिखने की ठानी दिल की बात

डॉ आशीष वशिष्ठ


जौनपुर में आयोजित वाईएमजीआर वर्कशाप
बच्चे देश का भविष्य हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि देश का भविष्य सुरक्षित नहीं है। आजादी के साढे छह दशकों के बाद भी देश के करोड़ों बच्चे मौलिक अधिकारों और बुनियादी सुविधाएं से वंचित हैं। लेकिन इस अहम् मुद्दे पर सरकारी मशीनरी, सिविल सोसायटी और मीडिया की चुप्पी हैरान करने वाली है। यदा-कदा ही मीडिया की नजर बाल अधिकारों से जुड़े मसलों पर पड़ती है। पिछले एक दशक में इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में प्रसारित और प्रकाशित खबरों का आकलन किया जाए तो बाल अधिकारों के हनन और संरक्षण से जुड़ी खबरें उंगुलियों पर गिनी जा सकती हैं। गैर सरकारी संगठनों और एनजीओ के प्रयासों से यदा-कदा बाल अधिकारों के हनन और शोषण से जुड़ी खबरें छनकर बाहर आती हैं और अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। लेकिन अपराध, राजनीति और सेक्स की खबरों और टीआरपी के फेर में दिन-रात खबरें सूंघने वाला मीडिया बाल अधिकारों के हनन और शोषण से जुड़ी खबरों से दूरी बनाये रहता है। बोरवेल में गिरे बच्चे के खबर से टीआरपी बटोरने और लाइव रिर्पोटिंग करने वाले न्यूज चैनलों को गली-चौराहों के होटलों, ढाबों और दूसरे कार्यों में दिन-रात जुटे बाल मजदूर जब दिखाई नहीं देते हैं तो हैरानी होती है। असल में बाल अधिकार से जुड़े मुद्दों और मसलों की कार्मिशियल वैल्यु और टीआरपी नहीं है इसलिए मीडिया इस  संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे के प्रति अक्सर उदासीन ही दिखाई देता है। 

भविष्य की खबर लिखते युवा रिपोर्टर
बच्चे हमारा भविष्य हैं ऐसे में बच्चों के अधिकारों के संरक्षण से जुड़े मुद्दों और उनसे जुड़ी परेशानियों और समस्याओं को कौन लिखेगा,  प्रकाशित और प्रसारित करेगा यह यक्ष प्रश्र है। बच्चों की आवाज को  देश और दुनिया तक पहुंचाने की बड़ी जिम्मेदारी किसकी है और कौन इस जिम्मेदारी का निर्वहन करेगा। बाल अधिकारों के संरक्षण से जुड़े अहम् मसले को  प्रदेश में बुलंद करने, उसके प्रति जागरूकता बढ़ाने और प्रदेश में बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में चल रहे कार्यों और योजनाओं को मजबूत करने की दिशा में एक साझा मंच तैयार करने का बीड़ा उठाया है। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए बने इस मंच का नाम है उत्तर प्रदेशसिविल सोसायटी एलायंस फार चाइल्ड प्रोटेक्षन (यूपी-सीएसए)। पूर्वांचल ग्रामीण विकास संस्थान (पीजीवीएस) के सचिव एवं यूपी-सीएसए के संयोजक डॉ. भानू के अनुसार, ‘प्रदेश में बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में कई संगठन कार्य कर रहे हैं, बावजूद इसके समन्वित प्रयासों की जरूरत है।’ भारत सरकार की इंटीग्रेटिड चाइल्ड  प्रोटेक्शन स्कीम (आईसीपीसी) में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए सिविल सोसायटी की भूमिका का उल्लेख है। इसी के मद्देनजर यूपी-सीएसए के बैनर तले एक कार्यषाला का अयोजन पिछले वर्ष सितंबर में बनारस में हुआ था। वाराणसी में तैयार रोड मैप को आगे बढ़ाते हुए आगामी 22 फरवरी को लखनऊ में राज्य स्तरीय एक दिवसीय वर्कशाप का आयोजन हो रहा है। जिसमें सरकारी मशीनरी के साथ बाल अधिकारों की दिशा में कार्यरत युनिसेफ, पीजीवीएस, सेव द चिल्ड्रन, क्राई, प्लान इण्डिया, आंगन, डीजीवीएस, एसआरएफ, एमएसके, एआईएम जैसी नामी संस्थाएं व सिविल सोसायटी के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ हिस्सा ले  रहे हैं।

हम लिखेंगे अपनी बात
यूपी-सीएसए से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रजनीकांत वशिष्ठ के अनुसार, बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों को देश-दुनिया तक पहुंचाने के लिए इन मुद्दों के प्रकाषन और प्रसारण की कापफी जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्यवश इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया की रूटीन रिपोर्टिंग में ऐसी खबरों को स्थान नहीं मिल पाता है। वहीं गांवों व दूर-दराज के क्षेत्रों में मीडिया प्रतिनिधियों की पहुंच न होना भी एक बड़ा मुद्दा है ऐसे में यह विचार किया कि क्यों न बच्चों से ही बच्चों की बात लिखवाई जाए। इसी विचार से शुरू हुआ यंग जनरेशन मीडिया रिपोर्टर (वाईएमजीआर) का सफर। 

डॉ.  भानू के अनुसार, यंग जनरेशन मीडिया रिपोर्टर एक संकल्पना है जिसमें पत्रकारिता के माध्यम से बच्चों को हमें उनके अधिकारों के प्रति सचेत करना होगा ताकि न सिर्फ वे अपनी नयी भूमिका को समझ सकें बल्कि उसे आत्मसात भी करें। डॉ. भानू बताते हैं कि, यंग जनरेशन मीडिया रिपोर्टर जिन्हें हम आने वाले वक्त का जिम्मेदार पत्रकार मान सकते हैं, ऐसे बालकों को न सिर्फ पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों को बताने की जरूरत है बल्कि सिविल सोसाइटी एलायंस (सीएसओ), संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अधिवेषन, इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन  स्कीम (आईसीपीएस), किशोर न्यायालय (जुवेनाइल जस्टिस), चाइल्ड लाइन के बारे में बताया जाना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से भी  हमें यह बात समझनी होगी कि एक बच्चा ही अपनी जरूरतों और अधिकारों के बारे में सबसे बेहतर तरीके से समझ सकता है।
सिद्वार्थनगर वर्कशाप के युवा रिपोर्टर
रजनीकांत कहते हैं, इससे बेहतर और क्या होगा जब बच्चे खुद को बाल पत्रकार के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करते हुए अपनी तकलीफों का ही बयान नहीं करेगा बल्कि अपने सपनों की दुनिया से भी हमें परिचित भी करायेगा। उसके इस बदले हुए रूप को न सिर्फ उसके अभिभावक, समाज में बैठे लोग, सरकार के जिम्मेदार अधिकारी कौतूहल और जिज्ञासा के साथ देखेंगे बल्कि इस बदलाव के लिए उसकी पीठ भी थपथपायेंगे। इसे मीडिया, सरकारें, डेवलपमेंटल गतिविधियों से जुड़े लोग गंभीरता के साथ लेंगे और बाल अधिकारों के संरक्षण का अनुकूल एवं उत्साहवर्धक वातावरण बन सकेगा। 

वाईएमजीआर की प्रथम दो दिवसीय मीडिया वर्कशाप का आयोजन पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के बख्शा ब्लाक के औका गांव में पिछले साल 29 व 30 अगस्त को हुआ। इसमें जौनपुर जिले के तीन ब्लाक बख्शा, करंजीकला और बदलापुर के विभिन्न गांवों के लगभग 30 बच्चें व युवाओं ने इसमें हिस्सा लिया। जौनपुर की वाईएमजीआर वर्कशाप के बाद प्रदेश के सिद्वार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, गोरखपुर और बहराइच जिलों में वर्कशाप का आयोजन हो चुका है। वाईएमजीआर की मीडिया टीम से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप उपाध्याय कहते हैं, ग्रामीण बच्चों की समझ कमाल की है भले ही वो पत्रकारिता की बारीकियों से बावस्ता नहीं है लेकिन मुद्दों और मसलों को समझने की शक्ति और संवेदनशीलता उनमें है। प्रदीप कहते हैं, आने वाले समय में बाल अधिकार से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर युवा पत्रकार अपनी कलम चलाएंगे और बच्चों द्वार लिखित रिपोर्ट और विभिन्न समस्याओं को यूपी-सीएसए ‘युवा संदेश’ शीर्षक पत्र अथवा न्यूज लैटर के माध्यम से देश-दुनिया के सामने लाएगा।  

पीजीवीएस के वरिष्ठ अधिकारी जीएन यादव कहते हैं, बच्चों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं। हमें इन्हें गंभीरता से लेना होगा। यंग जनरेशन मीडिया रिपोर्टर के जरिये हम इस  दिशा में बेहतर पहल कर सकते हैं। हमें बच्चों को उनके कर्तव्यों, दायित्व बोध तथा अधिकारों के प्रति सजग करते हुए सतत प्रशिक्षण देना होगा। उनका षिक्षा, भोजन तथा आश्रय का अधिकार उन्हें हासिल हो सके इसके लिए अनुकूल माहौल बनाने के साथ बाल श्रम, मानव तस्करी, बाल विवाह, कुपोषण तथा शिक्षा प्राप्त करने के बेहद कम अवसर सरीखी जो चुनौतियां हैं उनसे भी निपटना होगा। 

पीजीवीएस के चाइल्ड राइटस प्रोजेक्ट से जुड़े संदीप पाठक के अनुसार, वाईएमजीआर की वर्कशाप में बच्चों को बाल अधिकारों के बारे में बताया जाता है। इनमें जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास का अधिकार तथा सहभागिता का अधिकार शामिल है। वर्कशाप में बच्चों को इन अधिकारों के बारे में विस्तार से बताया जाता है। यह अपने आप में नया प्रयोग है जिसके उत्साहजनक नतीजे देखने को मिल रहे हैं। बाल अधिकारों की जानकारी के बाद बच्चों को रिर्पोटिंग एवं मीडिया राइटिंग की बेसिक जानकारी दी जाती है।

वाईएमजीआर से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप उपाध्याय के अनुसार, ‘बच्चे बाल अधिकारों के संरक्षण के बारे में तभी लिख पाएंगे जब उन्हें बाल अधिकारों के बारे में पता होगा।’ जौनपुर जिले के विकास खण्ड बख्शा के पिछड़े गांव नेवादा काजी की इंटर की छात्रा अन्तिमा भारती (15 वर्ष) गर्व से खुद को यंग जनरेशन मीडिया रिपोर्टर बताती है। बकौल अंतिमा, गांवों में बच्चों के अधिकारों का हनन आम बात है। मीडिया वर्कशाप के बाद मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है। मुझे लगता है अब हमारी आवाज देश और दुनिया तक जरूर पहुंचेगी। जौनपुर जिले के गांव मुरादपुर कोटिला के शशिकांत कहते हैं, वाईएमजीआर बच्चों और युवाओं की आवाज बनकर उभरेगा, अब हमारी बात कोई दबा नहीं पाएगा।  डॉ. भानू बताते हैं कि, बच्चों में इस बात का उत्साह है कि उनका लिखेगा छपेगा और दुनिया उसे पढ़ेगी। हमारे व बच्चों दोनों के लिए ये नया व अनूठा प्रयोग है।

वाईएमजीआर रिपोर्टर अंतिमा भारती
जिला बाराबंकी के गांव उदवतपुर, के सातवीं कक्षा के छात्र आशीष कुमार वर्मा के अनुसार, बच्चों की बातें कोई लिखना नहीं चाहता है। अब हमारे लिए वाईएमजीआर को मंच है। हम अपनी और अपने आस-पास के बच्चों के अधिकारों के हनन से जुड़ी बातों को लिखेंगे जिसे दुनिया पढ़ेगी। सेंट जोसेफ स्कूल, उसका बाजार, सिद्वार्थनगर की आठवीं कक्षा की छात्रा प्रिया पाण्डेय कहती है, बच्चों की बात बच्चों से बेहतर कौन समझ और लिख सकता है, अब हम लिखेंगे और उम्मीद है कि बच्चों की दुनिया बदलेगी। महाराजगंज के जीएसवीएस इंटर कालेज की ग्यारहवी की छात्रा प्रतिभा प्रजापति कहती है कि, अखबारों और न्यूज चैनलों में बच्चों से जुड़ी खबरें छापी और दिखाई जाती है उनमें अपराध की घटनाएं ज्यादा होती है लेकिन बाल अधिकारों की बात नहीं होती है। वाईएमजीआर के माध्यम से जब बच्चे अपनी बात खुद लिखेंगे तो मीडिया भी इन मुद्दों की संवेदनषीलता को समझेगा। 

डॉ. भानू के अनुसार, यूपी-सीएसए के दिशा-निर्देशन में होने वाली इन मीडिया वर्कशाप में कई स्थानीय संस्थाएं नवोन्मेष, महिला प्रशिक्षण सेवा संस्थान, सम्मान विकास समिति, मानवोदय विद्यालय, जीवनधारा मार्गदर्शन सोसायटी सहभागी हैं। फिलहाल जौनपुर, सिद्वार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, गोरखपुर और बहराइच छह जिलों में वाईएमजीआर वर्कशाप का आयोजन किया गया है। भविष्य में प्रदेश भर में ऐसी मीडिया वर्कशाप के आयोजन की तैयारी की जा रही है। प्रदेश में अपने तरह का यह प्रथम अनूठा प्रयोग है, उम्मीद की जानी चाहिए कि इस प्रयोग के सकारात्मक परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे।

मूल्यहीन राजनीति का दौर

वर्तमान में राजनीति सिद्धांतों, मूल्यो और मुद्दों से भटक गई है। लगभग सभी राजनैतिक दल सत्ता मंच आने या सत्ता में बने रहने के लिये राष्ट्र की सुरक्षा व संस्कृति को भी दांव पर लगाने से भी नही हिचक रहे हैं। वोट बैंक, अवरसारवादी गठजोड़, जात-पात और तुष्टिकरण की नीति के चलते राजनीतिक दल और नेता राजनीति के मूल चरित्र अर्थात देश और जनसेवा को भूलकर सत्ता में बने रहने और हथियाने के फेर में लगे हैं। भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा है और जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। विधायिका सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में सनी है। देश के आम आदमी का राजनीति और नेताओं से भरोसा उठ चुका है। लोकतंत्र के चार खंभों में से सबसे महत्वपूर्ण खंभे विधायिका का गिरता चरित्र और मूल्यहीनता पूरे लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत और खतरे की घंटी है, बावजूद इसके मूल्यहीनता में उत्तरोतर बढ़ोतरी हो रही है। मूल्यों की राजनीति अब इतिहास की बात होती चली जा रही है। आज की राज्नीति मे इसके लिये जगह बहुत छोटी हो गयी है। यही कारण है कि मूल्यवान लोग राजनीति मे नही आ पा रहे हैं। 

आजादी से पूर्व राजनीति मूल्यों से भरपूर थी तो वर्तमान में राजनीति पूर्णतरू मूल्यहीनता की स्थिति में पहुंच गया है। वर्तमान में राजनीतिक दलों के व्यवहार और कार्यकलापों पर दृष्टि डालें तो लगता है कि राजनीति राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और सामाजिक परिवर्तन के ध्येय से विमुख होकर सत्ताभिमुखी हो गई है। राष्ट्र और जनसेवा का स्थान सत्ता की आंकाक्षा और सत्ता के भोग ने ले लिया है। इसमें से अनेक प्रकार की विकृतियां उत्पन्न हुई हैं, सत्ता प्राप्ति की महत्वाकांक्षा, दलबदल, अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, विशेषरूप से सार्वजनिक जीवन के उच्च स्थानों पर व्याप्त भ्रष्टाचार, तुच्छ स्वार्थों और लाभ के लिए जनभावनाओं को भड़काने की प्रवृत्ति, वोट बैंक की राजनीति के चलते विकृतियों के कारण आज भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में शुचिता की भारी कमी आ गई है और राजनीति में मूल्यहीनता सिर चढ़कर बोल रही है। राष्ट्र और जनहित से जुड़े तमाम मुद्दों पर जिस तरह से राजनीतिक दल और नेताा जिस तरह की ओछी बयानबाजी और तुच्छ राजनीति करते हैं वो देश की आंतरिक सुरक्षा और साख को ही दांव पर लगाने से बाज नहीं आते हैं। 

आज देश मे जो स्थिति है उसमें सरकार, विपक्षी दल व थैलीशाहों अमीरों के बीच एक नापाक जुगलबंदी साफ दिखती है जिन्हें सिर्फ अपने हितों और स्वार्थ की चिन्ता है। इस कारण आम मध्यमवर्गीय व गरीब आदमी की जिंदगी दिनों दिन मुश्किल होती जा रही है। देश के विपक्षी दलो से यह अपेक्षा थी कि वे सरकार की जन विरोधी व तुष्टीकरण नीतियों का विरोध करते लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनो ही कारपोरेट और औद्योगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपिनयों की मजबूत लाबी की तुष्टिकरण की नीतियों को बढ़ावा देने में लगे हैं, जिससे आम आदमी के हितों की बली चढ़ रही है। राजनीतिक विचारधारा इस कदर राह भटक चुकी है कि अपराधियों को पानी पी-पीकर अपशब्द बोलने वाले, गांधी की सौंगध खाने वाले  टिकट वितरण के समय तमाम आदर्श, सिद्वांत और शुचिता भूलकर बाहुबलियों को छांट-छांटकर टिकट देते हैं। इस मामले में कोई भी पार्टी दूध की धुली नहीं है। कथनी और करनी का फर्क चुनाव में दिखाई देता है। सत्ता हासिल करने के लिए राजनीतिक दल साम-दाम-दण्ड और भेद की राजनीति करने से गुरेज नहीं करते हैं। राजनीति का चरित्र केवल सत्ता प्राप्ति हो गया है, और सत्ता प्राप्ति की राह में मूल्यों बुरी तरह रौंदे जाते हैं। 

वोट बैंक और जात-पात की राजनीति पूरे उफान पर है। अल्पसंख्यकों और दलितों के मसीहा बनने की कोशिश पर किसी को ऐतराज नहीं है पर क्या उनके पास इस बात का कोई जवाब है कि आखिर आजादी के 65 वर्षों बाद भी इन वर्गों की स्थिति सुधरी क्यों नहीं। क्या वे इस बात का जवाब दे सकते हैं कि आखिकर इसी देश में पैदा होकर पलने-बढने वाला बच्चा जवान होकर इसी देश के खिलाफ हथियार क्यों उठा रहे हैं। क्या उनके पास इस बात का जवाब है कि जो लोग देश के बंटवारे के समय कहीं और जाने के बजाय यहीं रहना बेहतर मानते थे उनके बच्चे दूसरे देश की ओर क्यों ताकने लगे हैं। सवाल तमाम हैं जात-पात की राजनीति करने वाले स्वार्थी और ढोंगी नेताओं के लिए जो तुच्छ राजनीति की खातिर अल्पसंख्यकों और दलितों को इंसान समझने के बजाय वोट डालने वाले मशीन समझते हैं और जाति, धर्म, भाषा, नस्ल और लिंग यह सब लोगों को आपस में बांटते हैं। हमारे राजनेता हमारे बीच अलगाव के बीज बोने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। राजनीतिक दल एक दूजे पर कीचड़ उछालने और दोषी बताने में तो आगे रहते हैं परंतु वस्तुतरू समस्त राजनीतिक दलों का मकसद एक ही है और वह है अपना-अपना वोट बैंक बनाना और बचाना।

वर्तमान भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा दोष यह है कि हमारे प्रतिनिधि संसद में शोर मचाते हैं और सड़क पर एक दुसरे का बखिया उखेड़ते हंै लेकिन अंदर ही अंदर सबमें गहरी जुगलबंदी और गठजोड़ है। मूल्यहीन सुविधाओं, ढांचों और संस्थाओं से सरकार व सत्ता तो चल सकती है, पर सही मामलों में लोकतंत्र का विकसित होना मुश्किल होता है। ऐसा राज्य जिस जनता को विकसित करेगा, उसमें मूल्यहीनता, लालच और सुख-साधनों की चाह ही भरी होगी। इसके कारण समाज में असंतोष और टकराहटे बनी रहेंगी, वर्तमान हालात इसी ओर इशारा करे रहे हैं। आज यह जरूरी हो गया है कि देश की राजनीति को मूल्यों और मुद्दो की पटरी पर वापस लाने के लिये पहल की जाये तथा देश में राष्ट्रभक्त और राष्ट्रसेवा से परिपूर्ण राजनीति को उभारने के लिये जनमानस तैयार किया जाऐ।  और जबतक मूल्यवान लोग राजनीति मे नही आते, तबतक आदर्शों और निष्ठा की बात तो होगी, उस पर अमल नही होगा। भ्रष्टाचार दूर करने के लाख उपाय कर लिये जायें, मगर वह दूर नही होगा। अवसरवाद को बढ़ावा मिलता रहेगा। दलबदल होते रहेंगे। मूल्यहीनता की राजनीति करनेवाले लोगों ने ही राजनीति के तालाब को गंदला किया है।

डॉ आशीष वशिष्ठ 

लोकतंत्र की हर प्रक्रिया से जुड़ना चाहिए: अमित शुक्ला

लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी एडवोकेट अमित शुक्ल ने जारी किया घोषणा-पत्र

राजधानी लखनऊ के प्रेस क्लब में विधान परिषद् स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के प्रत्याशी एडवोकेट अमित शुक्ला द्वारा समस्त स्नातक मतदाताओं व् नागरिक गण के सम्मुख निर्वाचित होने की दशा में किये जाने वाले कार्यो से सम्बंधित घोषणा पत्र जारी किया गया।  कार्यक्रम का आयोजन लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जन सहभागिता को बढाने के लिए कार्य कर रही संस्था सेण्टर फॉर न्यू सोशल एंड डेमोक्रेटिक इनिशिएटीव्स, लखनऊ (सीएनएसडीआई) द्वारा किया गया था। कार्यक्रम में डिप्लोमा इंजिनियर संघ के अध्यक्ष इंजीनियर हरिकिशोर तिवारी, नैतिक पार्टी के अध्यक्ष चंद्रभूषण पाण्डेय, पूर्व विधायक लखनऊ पश्चिम से राम कुमार शुक्ला, ऑटो संघ के पदाधिकारी पंकज दीक्षित, पियूष वर्मा, किरण सिंह एवं लल्लू, विनीत अवस्थी, साहित्यकार नसीम खान आदि ने कार्यक्रम  में भागीदारी की।

सभा को संबोधित करते हुए राम कुमार शुक्ला ने कहा की जब भी हम अपना प्रतिनिधि चुने जिसकी साफ सुथरी छवि हो। चंद्रभूषण पाण्डेय ने अपने संबोधन में कहा कि, आज जाति-धर्म की राजनीती की जा रही है जबकि जरुरी है की हम व्यक्ति को महत्व दे। लखनऊ स्नातक एमएलसी पद के निर्दलिय प्रत्याशी एडवोकेट अमित शुक्ला ने कहा कि, ‘हम सभी लोगो को अपने समाज को मजबूत बनाने के लिए न केवल लोकतंत्र की हर प्रक्रिया से जुड़ना चाहिए बल्कि उसमें पूरी भागीदारी भी करनी चाहिए।’ एडवोकेट अमित शुक्ला ने अपना घोषणा पत्र लोगो के सम्मुख जारी किया, जिसमें उन्होंने विधान परिषद् के सदस्य चुने जाने पर विकास सम्बंधित मुद्दों को लोगों के सामने रखा और जनता की राय मांगी तथा  निर्वाचित होने की स्थिति में इन कार्यों को पूरा करने का आष्वासन भी दिया। 

अमित शुक्ला नेजनयुग  को अपने चुनाव घोषणा पत्र के बारे में बताया कि, प्रत्येक जिले में समस्त वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए जागरूक लोगो के लिए नागरिक मंच का गठन कर उसके जरिये जिले की जरुरत का निर्धारण करके विकास कार्यो की कार्ययोजना बना क्रियान्वयन सुनिश्चित करूंगा। जिले की कार्ययोजना समग्र विकास की नीति पर आधारित हो, यानि की आर्थिक, सामाजिक विकास के साथ साथ प्रत्येक व्यक्ति का भी विकास सुनिश्चित हो इस प्रकार की नीति निर्धारण करूंगा। मुद्दों का निस्तारण जिले स्तर पर करने के साथ दृ साथ आवश्यकतानुसार प्रदेश एवं केंद्र के स्तर पर उसकी पैरोकारी करूंगा। युवाओं हेतु ऐसे रोजगार के अवसर पैदा किये जायेंगे जो उनकी रूचि एवं कौशल को और बेहतर बनाने के लिए सार्थक हो एवं उनके सम्पूर्ण विकास को सुनिश्चित करें। खीरी, सीतापुर व् बाराबंकी में नदियों की कटान से प्रभावित निवासियों को पुनर्स्थापित करने हेतु कार्य करना। बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त हरदोई, बाराबंकी व् लखनऊ को औद्योगिक व वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित करने हेतु कार्य करना। हरदोई, सीतापुर, खीरी, प्रतापगढ़ व् बाराबंकी में ऐसे शैक्षिक संस्थानों की स्थापना, प्रोत्साहन करना जो न केवल गुणवतापरक हो बल्कि आम आदमी की पहुंच में भी हो। अधिवक्ता व् शिक्षक दोनों वर्गों के लोगो के विकास हेतु इनके स्थापित संगठनो के साथ मिलकर कार्ययोजना तैयार करना व् उसका क्रियान्वयन सुनिश्चित करना। स्वास्थय सेवाओं की गुणवत्ता व् उसकी उपलब्धता की निगरानी नागरिक मंच के माध्यम से करना व् उसकी पहुंच सुनिश्चित करने हेतु पैरोकारी करना। विधान परिषद् का प्रतिनिधि नीति निर्धारक नहीं होता बल्कि समाज के विकास कार्यो जैसे की शिक्षा और क्षेत्र विशेष की समस्याओ का निर्धारण कर उन्हें दूर करने का कार्य करता है. अत इस हेतु गांव स्तर, ब्लॉक स्तर एवं जिले स्तर पर नागरिक मंच की सहभागिता से न केवल अपनी संस्कृति, परम्पराओं को जीवित करेंगे बल्कि एक सांस्कृतिक माहौल बनायेगे जो समाज को सकारात्मक दिशा देगा।

कार्यक्रम के अंत में सी.एन.एस.डी.आई. के निदेशक इमरान खान ने  सभी लोगो का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा की “वक्त आ गया है जब हम अपनी खामोशी को तोड़े और आगे बढ़कर देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे और देश व् समाज को सशक्त बनाएं।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी आज भी उप्र सरकार के मंत्री

लखनऊ। सरकारी विभागों की सुस्त रफ्तार और लाहपरवाही किसी से छिपी नहीं है। प्रदेश में नयी सरकार के गठन को लगभग दो साल होने जा रहे हैं लेकिन कई विभागों की बेवसाइटों में बसपा सरकार के मंत्री आज भी मंत्री पद पर सुशोभित हैं। यह सूचना आरटीआई कार्यकर्ता अमिताभ ठाकुर और नूतन ठाकुर द्वारा किये गए एक अध्ययन से सामने आई हैं।

जहां आरटीआई एक्ट की धारा 4 के अनुसार प्रत्येक लोक सेवक के लिए अनिवार्य है कि वे अपने सभी रिकॉर्ड को सूचीबद्ध कर उन्हें कम्प्यूटरीकृत करें और इस एक्ट के पारित होने के 120 दिनों के अन्दर उन्हें प्रकाशित करें, वहीँ उत्तर प्रदेश सरकार में जमीनी हकीकत इसके काफी विपरीत जान पड़ती है। इन दोनों ने यूपी सरकार के वेबसाइट पर प्रदर्शित 81 विभागों का विशेषकर धारा 4(1)(बी) में निर्धारित अनिवार्य सूचना की आवश्यकता की दृष्टि से अध्ययन किया।

अध्ययन से यह पाया गया कि लगभग किसी भी विभाग ने अपने कार्यों में प्रयुक्त नियम, नियमावली, निर्देश, मैनुअल और रिकॉर्ड आदि को इलेक्ट्रॉनिक स्वरुप में प्रस्तुत नहीं किया है. यह भी पाया गया कि ज्यादातर सूचनाएँ काफी पुरानी हैं। इसीलिए आज भी आरटीआई के सरकारी अभिलेखों में नसीमुद्दीन सिद्दीकी गन्ना विकास, नारायण सिंह उद्यान, लालजी वर्मा संसदीय कार्य तथा जगदीश नारायण राय हथकरघा विभाग के मंत्री के रूप में दर्ज हैं, जबकि वे मार्च 2012 में पद छोड़ चुके हैं। इसी प्रकार काफी पहले रिटायर हो चुके आर के शर्मा को उद्यान, श्री कृष्ण को हथकरघा तथा एस सी गुप्ता को आईटी विभाग में कार्यरत दिखाया जा रहा है।
ज्यादातर विभागों में जन सूचना अधिकारी और अपीलीय अधिकारियों के नाम पुराने लिखे हैं और कईयों में अधूरी जानकारी दी गयी है. इसी प्रकार ज्यादातर विभागों में बजट का वर्ष नहीं दर्शाया गया है और कई विभागों में 2008-09 या 2009-10 जितने पुराने बजट ही दिखाए गए हैं।

प्राथमिक शिक्षा, समन्वय, संस्कृति, वित्त, मत्स्य, आधारभूत संरचना जैसे विभागों में आरटीआई में बहुत कम जानकारी दी गयी है। समग्र ग्राम विकास और लघु उद्योग और निर्यात प्रोत्साहन विभाग में आरटीआई का उल्लेख तक नहीं है जबकि राजस्व और विधाई विभाग में  आरटीआई के लिंक तो हैं लेकिन नेट पर सम्बंधित लिंक नहीं खुलता है। राज्यपाल कार्यालय की आरटीआई सूचना मात्र अंग्रेजी में है जबकि मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा सीमित सूचनाएं ही दी गयी हैं। श्री ठाकुर और डॉ नूतन ने इन स्थितियों को समाप्त कराने हेतु सभी प्रयास करने की बात कही है।

उद्देश्य से भटका स्नातक व शिक्षक निर्वाचन

डॉ आशीष वशिष्ठ


देश के छह राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में द्विसदन की व्यवस्था है। देश में राजनैतिक स्थिरता, विकास, कानून और नीति निर्माण में विषय विशेषज्ञता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संविधान निर्माताओं ने ये व्यवस्था की थी। लेकिन विधान परिषद का स्नातक और शिक्षक निर्वाचन उद्देश्य से भटकता दिख रहा है। स्नातक निर्वाचन में तो गंभीर चुनावी खामियां व्याप्त हैं। इन चुनावों का प्रारूप वास्तव में लोकतान्त्रिक भावना के विपरीत हो चला है। मौजूदा प्रारूप असल में स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के केवल एक सुविधाजनक अंश का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रत्याशियों के लिए अनुकूल पाया गया है। इसके अलावा नए स्नातकों के साथ तीन वर्ष तक भेदभाव, वर्तमान शैक्षिक संदर्भ में पूर्वाग्रहित है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और संबंधित चुनाव, वर्तमान परिस्थितियों में वैधानिक उदासीनता की वजह से अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। राजनैतिक विशलेषक डॉ. दिलीप अग्रिहोत्री कहते हैं, राज्यों में उच्च सदन की भावना व उद्देश्य बुरी तरह आहत हो रहा है।

उप्र विधान परिषद में 100 सदस्यों में से आठ-आठ स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित होते हैं। यह 16 एमएलसी प्रदेश भर के लाखों स्नातकों और शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन जिस वर्ग का वोट पाकर ये लोग माननीय बनते हैं उस वर्ग में इस चुनाव के प्रति जागरूकता का अभाव है। स्नातक निर्वाचन सीटों पर तो हालात ज्यादा खराब हैं। इन सीटों पर पिछले लंबे समये से चंद लोगों का कब्जा है। अगले साल उप्र में 6 शिक्षक और 5 स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव होंगे। राज्य निर्वाचन आयुक्त उमेश सिन्हा कहते हैं, निर्वाचन आयोग अधिक से अधिक वोटरों को इन चुनाव से जोडने में प्रयासरत है। लेकिन राजधानी लखनऊ में ही स्नातक चुनाव का वोटर अभियान ठण्डा पड़ा है। बूथों पर सन्नाटा पसरा है तो वहीं बूथ लेबिल अधिकारी (बीएलओ) का कहीं अता-पता नहीं है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भी औचक बूथ निरीक्षण में गड़बडिय़ां मिली हैं।

लखनऊ स्नातक निर्वाचन के निर्दलीय प्रत्याशी एडवोकेट अमित शुक्ला के अनुसार, असल में एमएलसी चुनाव पैसे और सोशल सर्किल के दम पर जीतने की परंपरा बन चुकी है। ज्यादातर स्नाताकों को इस चुनाव की जानकारी नहीं है। लखनऊ स्नातक सीट के पिछले चुनाव में कुल मतदाताओं की संख्या तकरीबन डेढ़ लाख थी। जबकि लखनऊ निर्वाचन क्षेत्र में सात जिले आते हैं और हर साल तकरीबन 1 लाख नये ग्रेजुएट मौजूदा संख्या में जुड़ते हैं। चुनाव आयोग भी इस चुनाव के प्रति गंभीर नहीं है। इसी का नतीजा है कि उच्च सदन वे लोग चुनकर आ रहे हैं जो इसमें प्रतिनिधित्व करने के लायक नहीं हैं। बाहुबली, धनकुबेर और मठाधीशों के चंगुल में फंसे उच्च सदन की गरिमा गिरती जा रही है। सरकारी प्रयासों के साथ स्नातकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपना पंजीकरण कराकर सही प्रतिनिधि चुनें।

इंडियन नेशनल यूथ मूवमेंट के तपेश गौतम कहते हैं, अति-सक्रिय एवं आत्म-केन्द्रित अध्यापक संघो के चलते, विधान परिषद् (अध्यापक) के चयन की प्रक्रिया, चुनावी रूप से आज ज्यादा प्रासंगिक है। इसके विपरीत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं। तपेश के अनुसार, बहुसंख्य छात्र-संघों का विफल होना भी एक समस्या है, जिसको स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के परिपे्रक्ष्य से देखना जरूरी है। वाराणसी स्नातक क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी रुपेश पाण्डेय के अनुसार, आजकल छात्र राजनीति का मतलब चाटुकारिता और सस्ती लोकप्रियता के बदले प्रतीकात्मक तुष्टिकरण तक सीमित होता जा रहा है। विधान परिषद में शिक्षक दल के नेता ओम प्रकाश शर्मा के अनुसार, राजनैतिक दल स्नातक और शिक्षक सीटों में हस्तक्षेप करने से उच्च सदन की भावना दूषित हो रही है। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अुनसार, यथाशक्य निकटतम बारहवां भाग उस राज्य में निवास करने वाले ऐसे व्यक्तियों से मिल कर बनने वाले निर्वाचक मंडलों द्वारा निर्वाचित होगा, जो भारत के राज्य क्षेत्र में किसी विश्वविद्यालय के कम से कम तीन वर्ष से स्नातक हैं या जिनके पास तीन वर्ष से ऐसी अर्हताएं हैं जो संसद द्वारा बनायीं गयी किसी विधि या उसके अधीन ऐसे किसी विश्वविद्यालय के स्नातक की अर्हताओं के समतुल्य विहित की गयी हो। आंकड़ों पर एक नजर डाली जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है, कि परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं। जहां उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रदर्शन बहुत खराब है, वही रोजगार के अवसर अनियंत्रित रूप से स्थानबद्ध हो गए हैं। इन मूल कारणों से युवावस्था में शिक्षा एवं व्यवसाय हेतु नियमित स्थानांतरण, आज के स्नातक वर्ग की एक अपरिहार्य वास्तविकता बन चुका है। इस नयी चिरस्थायी प्रवृति ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्रो को समावेशी बनाने की जगह, एकान्तिक बना दिया है। हालांकि यह विवरण आम चुनाव पर भी लागू होता है, किन्तु विधान परिषद् (स्नातक) चुनाव में इसका सांख्यिक परिमाण इतना वृहद् है कि उसे नजर अंदाज करना एक गंभीर भूल होगी। उत्तर प्रदेश और लगभग सारे द्विसदन राज्यों में रोजगार के असामान्य भौगोलिक वितरण, उच्च शिक्षा के न्यूनतम बुनियादी ढांचे और क्षेत्रीय राजनैतिक सहूलियत के अनुसार नीतियों के विरुपिकरण का जो विषाक्त मिश्रण तैयार हुआ है, उससे स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के विचार को अपूर्णीय क्षति हुई है।

स्थानीय प्रशासन द्वारा सामयिक निवास की असंगत व्याख्या करने के मामले जग-जाहिर हैं। चुनाव लगभग छह साल के अन्तराल पर होते हैं। वही आज की सामान्य कार्य संस्कृति के अंतर्गत, हर दो-तीन साल पर नौकरीशुदा स्नातकों के ट्रांसफर होते रहते हैं। सामयिक निवास से जुड़ी समस्याएं और भी जटिल होती जाती हैं। कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अक्सर ऐसे वरिष्ठ स्नातक मिल जाते हैं, जिन्होंने आज तक इन चुनावों में कभी भी मतदान नहीं किया। महिलाओ के लिए तो यह समस्या, विवाह सम्बंधित स्थानांतरण की वजह से बहुस्तरीय हो जाती है। डॉ. दिलीप अग्रिहोत्री वोटर बनाने ओर चुनाव प्रक्रिया को सरल बनाने की वकालत करते हैं। एडवोकेट अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी के अनुसार, इन मौलिक खामियों के अलावा, मुख्य व्यवहारिक समस्या इन चुनावों के लिए हो रहे अलग और भ्रामक पंजीकरण के रूप में सामने आती है। न्यू सोशल एण्ड डेमोक्रेटिक इनेशिएटिव के डायरेक्टर डॉ. इमरान खान कहते हैं, पंजीकरण की प्रक्रिया को कई बार जानबूझ कर इतना विकट कर दिया जाता है, कि ज्यादा प्रतिशत राजनैतिक दलों से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े लोगों का होता है। इस प्रकार एक प्रत्यक्ष चुनाव का चरित्र एक अधकचरे निर्वाचन मंडल के चुनाव जैसा बना दिया जाता है। जहां आम चुनाव में कुल मतदाताओ के बीच कम प्रतिशत होने से इस प्रभाव का आभास नहीं होता, वही विधान परिषद् (स्नातक) चुनाव में यह असंतुलन अक्सर परिणाम को प्रभावित कर देता है। चुनाव आयोग ने अपने वर्तमान चुनाव सुधार सम्बन्धी सुझावों में स्नातक एवं अध्यापक निर्वाचन क्षेत्रों के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। हालांकि प्रजातंत्र में राजनैतिक प्रतिनित्धित्व को खत्म करके किसी राजनैतिक समस्या का हल नहीं किया निकाला जा सकता, किन्तु चुनाव आयोग की निराशा यह दर्शाने के लिए काफी है कि यह समस्या कितनी व्यापक है।

टूरिज्म मैनजमेंट कंसलटेंट सय्यद रिजवान अहमद के अनुसार स्नातक और शिक्षक निर्वाचन में राजनैतिक दल अपना प्रत्याशी तो खड़ा करते हैं लेकिन कभी चुनाव घोषणा पत्र जारी नहीं करते। असल
में ये सारा घालमेल का मामला है। स्नातक निर्वाचन में फर्जी मतदाताओं और माफियाओं का कब्जा है। इस बार फर्जी वोटिंग रोकने के लिए निर्वाचन आयोग ने फोटो युक्त वोटर लिस्ट बनाने की पहल की है। किंतु निर्वाचन आयोग की यह पहल पूरी होती दिख नहीं रही है। बीएलओ और मठाधीश नेताओं के बीच गहरी सांठ-गांठ है। इन नेताओं को फायदा पहुंचाने के मकसद से बीएलओ वोटर बूथ से जान बूझकर नदारद रहते हैं जिसके कारण पंजीकरण के इच्छुक लोगों को वापस होना पड़ता है। स्नातक मध्यमवर्ग को अपने प्रतिनिधि चुनने के मामले में संजीदा माना जाता है। किन्तु आज अपरिहार्य स्थानांतरण प्रवृति और अनन्य जातिगत राजनैतिक धुरी के चलते, इस वर्ग की चुनावी प्रासंगिकता खत्म होती जा रही है। परिणामस्वरुप, विधान परिषद (स्नातक) जैसे विशेष प्रतिनिधत्व के सिमटते हुए दायरे की वजह से राजनैतिक दलों के लिए यह वर्ग चुनावी रूप से पूर्णतरू नगण्य हो गया है। यह चुनाव अब विशुद्ध स्नातक वर्ग की सहभागिता के बिना ही, राजनैतिक दलों द्वारा प्रबंधित कर लिए जाते हैं।

जनवादी नौजवान सभा के प्रवीण सिंह के अनुसार, नब्बे फीसद लोगों को स्नातक चुनाव के बारे में पता नहीं है और जिन्हें पता है वो दूसरे को बता भी नहीं रहे हैं। युवाओं की राजनैतिक सक्रियता की बात तब तक ढकोसला मात्र है, जब तक स्नातको की वास्तविक चुनावी भागीदारी को सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाये जाते, स्थानांतरण, पंजीकरण आदि की दिशा में यथार्थवादी नियमो के क्रियान्वयन की तत्काल आवश्यकता है। वहीं जनगणना के रुझान को देखते हुए, अब विधान परिषद् (स्नातक) का कार्य क्षेत्र बढ़ाये जाने का समय आ गया है। इन चुनावों में अध्यनरत पूर्व-स्नातकों तथा नए स्नातकों की भागीदारी को भी सुनिश्चित करने की जरुरत है।